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________________ स्थपति के साथ प्रेमक्रीड़ा की। कारण यही कि उसे प्रभावित कर इस मूर्ति को दोषपूर्ण शिला में बनवा सकती है। इसीलिए ऐसा किया। ऐसे ही दोषपूर्ण प्रस्तर से विग्रह बना। उसकी प्रतिष्ठा हुई तो आचार्य महाराज और धार्मिक रीति से विवाहित नयी रानी लक्ष्मीदेवी, इन सबका अमंगल होगा। ये सभी सुन्दर विग्रह जितने बने हैं, सुनते हैं कि ये सब उसी की भंगिमाएँ हैं। अर्धनग्न मूर्तियाँ बनवाने के लिए एक राज्य की पट्टमहादेवी गुप्त रूप में अपनी ही भंगिमाएँगह एक सामान भावहार है। एक ही भंगिमा में घण्टों तक रहे, सो भी एकान्त में ! कुछ और तरह की बातों का हो जाना असम्भव नहीं। नमक-मिर्च खानेवाले ही तो हैं? यह स्थपति घुमक्कड़ था। राजमहल का आश्रय पाकर यह भी मोटा-ताजा हो गया। हाथ लगी सुन्दरी के साथ मौज करने का मौका मिल गया तो छोड़ता क्यों? एक हो गये। योजना बनायी। पत्थर में पानी के होने पर भी मेढक के होने की बात जानते हुए भी, उसी की मूर्ति बनवायी। उन्होंने समझा होगा कि भगवान् अन्धा है, यह सब नहीं देखता होगा। लेकिन उसने देखा, अपने परम भक्त आचार्य को दोषी नहीं होने देना चाहिए, इसलिए उस युवक को प्रेरणा दी और ऐन वक्त पर उसे यहाँ भेज दिया। इससे यह धोखा-धड़ी खुल गयी। अब ठीक तरह की मूर्ति बन रही है। परन्तु प्रतिष्ठा के इस समारम्भ के लिए महाराज के साथ यह विर्मिणी पट्टमहादेवी रहेगी तो उसका बहिष्कार करना होगा । अन्यथा वह श्रीवैष्णव पन्थ पर अपचार होगा। उसका मौका नहीं देना चाहिए। उसका विरोध करना ही होगा, आदि-आदि तरह-तरह की बातें हो रही हैं। पट्टमहादेवी और स्थपति पर तरह-तरह के आरोप लगाये जा रहे हैं।" जकणाचार्य ने सब सुना। लेकिन तुरन्त प्रतिक्रिया नहीं दिखायी। मल्लोज ने सूचित किया कि इन सभी बातों से पट्टमहादेवी को आगाह कर देना उचित है। "पट्टमहादेवीजी से कोई बात छिपी नहीं होगी। वे सब देखती रहती हैं। यह सब खबर अब तक उनके पास पहुंच चुकी होगी। इन लोगों के बीच में भीड़ के साथ सजमहल के कितने गुप्तचर होंगे इसका तुम्हें पता न होगा। उन्हें उनके वेष से पहचान नहीं सकते। हमें निरासक्त भाव से मौन प्रेक्षक बनकर रहना होगा। यदि इसमें दिलचस्पी दिखावें तो उसका दूसरा ही अर्थ निकाला जा सकता है।" जकणाचार्य ने मल्लोज को बताया। "कल ऐन मुहत के वक्त धार्मिक लड़ाई के रूप में परिवर्तित होकर इसके दो जत्थे बन जाएँ और टकराव हो, हाथापाई होने लगे तथा परिस्थिति बदल जाए तो? बेचारे अनजान लोग हैं, यहाँ के इस उत्सव को देख आनन्दित होने आये हैं। उन सभी को तकलीफ होगी। इसलिए हमें जो राज मालूम है उसे राजमहल को न बतानें तो ठीक होगा? मुझे लगता है कि सूचित कर देना ही उचित है।" मल्लोज ने कहा। 10 :: पट्टमहादेवी शान्तला : भाग चार
SR No.090352
Book TitlePattmahadevi Shatala Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorC K Nagraj Rao
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages458
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Biography, & History
File Size9 MB
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