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________________ को तौलकर विचारने लगी, "सारी बातें उन्हें पालुम हो गयी हैं ! मगर मालूम हुई तो कैसे? मैंने तो कही नहीं! तो फिर? यहाँ मेरे विश्रामगृह में पिताजी से जो बातें हुई वे सब उन तक पहुँची कैसे ? सारी बातें बनाकर कह नहीं सकते। तो यही कहना होगा कि पिताजी ने कहीं किसी से कहा होगा। सुनकर किसी ने सन्निधान से कह दिया होगा। सन्निधान वास्तव में मुझे प्यार करते हैं । परन्तु आज की उनकी बातें सुनकर दिल काँप जाता है। ___ 'मुझको पिता चाहिए या पति-इसका निर्णय करने को कहा है। एक बार पिता को बता दें कि सतर्क रहें और तन्न सन्निधान के साथ चल दें, यों सोचा था। सो भो अब होने का नहीं। मतलब यह कि पूरी तौर से पिता का त्याग। यह सब राजमहलबालों को मालूम हो जाएगा। सबकी आँखों की किरकिरी बनकर वहाँ मुझे रहना पड़ेगा। तरह-तरह की आशाएँ बाँधकर, आकर्षक कल्पनाओं के चित्र सजाकर ऐसी अपमानजनक सन्दिग्ध अवस्था में पिताजी ने मुझे फंसाया? ऐसी हालत में मुझे इस राजमहल में क्या गौरव मिलेगा? मेरी ही हालत यह हो जाए तो मेरे बेटे का क्या भविष्य होगा? एक समय था कि मेरे पिता एक वरदान बनकर आये। अब क्यों अभिशाप बने हुए हैं ? यह सब मेरी समझ में ही नहीं आता। अब मेरे लिए दूसरा चारा क्या है ? सन्निधान के साथ जाना ही न? आगे देखा जाएगा। वह इस निश्चय पर जा पहुँची। उसी के अनुसार यात्रा शुरू हुई । लक्ष्मीदेवी के दिमाग में यह विचार आया कि जाते-जाते सस्ते में पिताजी से क्यों न मिल लें।..पर यह पूछे कैसे? लाचार हो चुप हो रही। राजपरिवार ने जगदल सोमनाथ पण्डित के साथ यदुगिरि में रात को मुकाम किया। तिरुवरंगदास प्रतीक्षा कर रहा था। उसे पहले ही यात्रा की सूचना मिल चुकी थी। लक्ष्मीदेवी से भेंट सन्निधान के समक्ष ही हुई। उसका चेहरा देखते ही मालूम हो गया कि वह दुखी है। उसने मन में सोचा कि जरूर कुछ बात है। तात्कालिक रूप से निराश होने पर भी बेटी ने महाराज के मन में गुस्सा पैदा कर दिया है न? यह पहला और अच्छा कदम है। बाप-बेटी को मौन देख महाराज बिट्टिदेव ने कहा, "हम दोरसमुद्र जा रहे हैं। फिलहाल यादवपुरी लौटने की सम्भावना नहीं। इसलिए यादवपुरी के राजमहल के एक हिस्से को अपने लिए सुरक्षित रख, शेष भाग में डाकरस दण्डनायक सपरिवार रहें, ऐसी व्यवस्था की गयी है। आपके लिए भी यादवपुरी में अलग निवास को व्यवस्था है। राजमहल में पहले जो स्थान आपके ठहरने के लिए तैयार किया गया था, उसे भण्डार -घर के लिए सुरक्षित किया गया है। यदि वहाँ ठहरने की आपकी इच्छा न हो तो यहाँ भी व्यवस्था की जा सकती है। अथवा आपकी इच्छा के अनुसार अन्यत्र चाहे जहाँ रह सकेंगे। स्थान बता दें तो वहीं को उचित व्यवस्था हो जाएगी। सब बातें पट्टमहादेवी शान्तला : भाग चार :: 245
SR No.090352
Book TitlePattmahadevi Shatala Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorC K Nagraj Rao
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages458
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Biography, & History
File Size9 MB
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