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________________ मोक्षमार्ग प्रपंच सूचिका चूलिका चला गया। ऐसा जानकर अब उस जीवके स्वभावमें निश्चल स्थितिरूप चारित्रको ही भावना करनी योग्य है जो साक्षात् मोक्षका कारण है। जैसा कहा है इसी तरह योंही अनंतकाल उनका बीत गया जो संसारके कारणरूप भावोंमें लवलीन हैं क्योंकि उन्होंने मोक्षके कारणोंके साधनेको कुछ भी नहीं जाना ।।१५४।। इस तरह जीवके स्वभावको कह करके जीवके स्वभावमें निश्चल ठहरना ही मोक्षमार्ग है ऐसा कहते हुए प्रथम स्थलमें गाथा कही। स्वसमयपरसमयोपादानव्युदासपुरस्सरकर्मक्षयद्वारेण जीवस्वभावनियतचरितस्य मोक्षमार्गत्वद्योतनमेतत् । जीवो सहाव-णियदो अणियद-गुणपज्जओध परसमओ । जदि कुणदि सगं समयं पब्भस्सदि कम्म-बंधादो ।।१५५।। जीवः स्वभावनियतः अनियतगुणपर्यायोऽथ परसमयः । ___ यदि कुरुते स्वकं समयं प्रभ्रस्यति कर्मबन्धात् ।।१५५।। संसारिणो हि जीवस्य ज्ञानदर्शनावस्थितत्वात् स्वभावनियतस्याप्यनादिमोहनीयोदयानुवृत्तिपरत्वेनोपरक्तोपयोगस्य सतः समुपातभाववैश्वरूप्यत्वादनियतगुणपर्यायत्वं परसमय: परचरितमिति यावत् । तस्यैवानादिमोहनीयोदयानुवृत्तिपरत्वमपास्यात्यन्तशुद्धोपयोगस्य सतः समुपात्तभावैक्यरूप्यत्वानियतगुणपर्यायत्वं स्वसमयः स्वचरितमिति यावत् । अथ खलु यदि कथञ्चनोद्भिन्नसम्याज्ञानज्योतिर्जीवः परसमयं व्युदस्य स्वसमयमुपादत्ते तदा कर्मबन्धादवश्यं भ्रश्यति । यतो हि जीवस्वभावनियतं चरितं मोक्षमार्ग इति ।।१५५।। अन्वयार्थ—( जीव: ) जीव, ( स्वभावनियतः ) ( द्रव्य-अपेक्षासे ) स्वभावनियत होने पर भी, ( अनियतगुणपर्याय: अथ परसमयः ) यदि अनियत गुणपर्यायवाला हो तो परसमय है। ( यदि ) यदि वह ( स्वकं समयं कुरुते ) ( नियत गुणपर्यायसे परिणमित होकर ) स्वसमयको करता है तो ( कर्मबन्धात् ) कर्मबन्धसे ( प्रभ्रस्यति ) छूटता है। टीका—यहाँ ( इस गाथामें ) जीवस्वभावमें नियत चारित्र को स्वसमयके ग्रहण और परसमयके त्यागपूर्वक कर्मक्षय द्वारा मोक्षमार्गपना दर्शाया है । संसारी जीव, ( द्रव्य-अपेक्षामे ) ज्ञानदर्शनमें अवस्थित होनेके कारण स्वभावमें नियत ( -निश्चलरूपसे स्थित ) होने पर भी. जब अनादि मोहनीयके उदयका अनुसरण करके परिणति करनेके कारण उपरक्त उपयोगवाला ( -अशुद्ध उपयोगवाला ) होता है तब भावोंका विश्वरूपपना ( -अनेकरूपपना ) ग्रहण किया होनेके कारण उसके जो अनियतगुणपर्यायपना होता है वह परसमय अर्थात् परचारित्र है। वहीं
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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