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________________ नवपदार्थ-मोक्षमार्ग वर्णन विवेकज्योतीरूपप्रथमशुक्लध्यानमनुभूय रागद्वेषरूपचारित्रमोहोदयाभावेन निर्विकारशुद्धात्मानुभूतिरूपं चारित्रमोहविध्वंसनसमर्थ वीतरागचारित्रं प्राप्य मोहक्षपणं कृत्वा मोहक्षयानंतरं क्षीणकषायगुणस्थानेतर्मुहूर्तकालं स्थित्वा द्वितीयशुल्कध्यानेन ज्ञानदर्शनावरणान्तरायकर्मत्रयं युगपदंत्यसमये निर्मूल्य केवलज्ञानाद्यनंतचतुष्टयस्वरूपं भावमोक्षं प्राप्नोतीति भावार्थः ।।१५०-१५१॥ एवं भावमोक्षस्वरूपकथनरूपेण गाथाद्वयं गतं। हिन्दी ता०-उत्थानिका-आगे शुद्धात्मानुभवरूप निर्विकल्प समाधिसे साधने योग्य व आगम भाषासे रागादि विकल्पोंसे राहत शुक्लध्यान से साधने योग्य मोक्षके अधिकारमें गाथाएँ चार हैं। उनमेंसे भावमोक्ष, केवलज्ञानकी उत्पत्ति, जीवन्मुक्तपना तथा अरहंत पद इनका एक ही अर्थ है, इन चार नामोंसे युक्त एकदेश मोक्षके व्याख्यानकी मुख्यतासे "हेदु अभावे' इत्यादि सूत्र दो हैं । उसके पीछे अयोग केवलि गुणस्थानके अन्तिम समयमें शेष अघाति द्रव्यकर्मोंसे मोक्ष होती है ऐसा कहते हुए "दंसणणाणसमग्गं' इत्यादि सूत्र दो हैं । ऐसे चार गाथाओंके द्वारा दो स्थलोंमें मोक्षके अधिकारके व्याख्यानमें समुदायपातनिका अन्वय सहित सामान्यार्थ-( हेदुमभावे) मिथ्यात्व आदि द्रव्य कमेकि उदय रूप कारणोंके न रहनेपर (णियमा.) नियमसे ( णाणिस्स) भेदविज्ञानी आत्माके ( आसवणिरोधी) रागादि आस्रव भावोंका रुकना होता है । ( आसवभावेण विणा) रागादि आस्रव भावोंके बिना ( कम्मस्स) नवीन द्रव्य कर्मोका [दु] भी [णिरोधो] रुकना हो जाता है । [य] तथा [कम्मस्स अभावेण] चार घातिया कर्मोके नाश होने पर [ सव्वण्हू ] सर्वज्ञ [य] और [ सबलोगदरसी] सर्व लोकको देखनेवाला [इन्दियरहितं] इन्द्रियोंकी पराधीनतासे रहित [अव्यावाहं ] बाधा या विघ्न रहित व [ अणतं] अन्त रहित (सुहं ) सुखको ( पावदि) पा लेता है। विशेषार्थ-भाव क्या है उससे मोक्ष होना क्या है-इस प्रश्नके उत्तरमें कहते हैं-कर्मोक आवरणमें प्राप्त संसारी जीवका जो क्षायोपशमिक विकल्परूप भाव है वह अनादिकालसे मोहके उदयके वश रागद्वेष मोहरूप परिणभता हुआ अशुद्ध हो रहा है यही भाव है। अब इस भावसे मुक्त होना कैसे होता है सो कहते हैं। जब यह जीव आगमकी भाषासे काल आदि लब्धिको प्राप्त करता है तथा अध्यात्म भाषासे शुद्ध आत्माके सन्मुख परिणामरूप स्वसंवेदन ज्ञानको पाता है तब पहले मिथ्यात्व आदि सात प्रकृतियोंके उपशम होनेपर फिर उनका क्षयोपशम होनेपर सराग सम्यग्दृष्टि हो जाता है। तब अहंत आदि पंचपरमेष्ठीकी भक्ति आदिके द्वारा परके आश्रित धर्मध्यानरूप बाहरी सहकारी कारणके द्वारा मैं अनंत
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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