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________________ पंचास्तिकाय प्राभृत २८१ जीवाजीवौ भावी पुण्यं पापं चास्सवस्तयोः । संवरनिर्जराबंधा मोक्षश्च भवन्ति ते अर्थाः ।।१०८।। जीवः, अजीवः, पुण्यं, पापं, आस्रवः, संवरः, निर्जरा, बंधः, मोक्ष इति नवपदार्थानां नामानि । तत्र चैतन्यलक्षणो जीवास्तिक एवेह जीवः । चैतन्याभावलक्षणोऽजीवः स पंचया पूर्वोक्त एव पुनलास्तिकः, धर्मास्तिकः, अधर्मास्तिकः, आकाशास्तिकः, कालद्रव्यं चेति । इमौ हि जीवाजीवौ पृथग्भूतास्तित्वनित्तत्वेन भिन्नस्वभावभूती मूलपदार्थों । जीवपुछलसंयोगपरिणामनिर्वृत्ताः सप्तान्ये पदार्थाः । शुभपरिणामो जीवस्य, तनिमित्तः कर्मपरिणामः पुगलानां च पुण्यम् । अशुभपरिणामो जीवस्य, तन्निमित्तः कर्मपरिणामः पुगलानां च पापम् । मोहरागद्वेषपरिणामो जीवस्य, तनिमित्तः कर्मपरिणामो योगद्वारेण पुद्गलानाञ्चालवः । मोहरागद्वेषपार. णामनिरोधो जीवस्य, तन्निमित्तः कर्मपरिणामनिरोधो योगद्वारेण प्रविशतां पुदलानां च संवरः । कर्मवीर्यशांतनसमथों बहिरङ्गन्तरंगतपोभिर्वहितशुद्धोपयोगो जीवस्य, तदनुभावनीरसीभूतानामेकदेशसंक्षयः समुपातकर्मपुद्गलानाञ्च निर्जरा । मोहरागद्वेषस्निग्धपरिणामो जीवस्य, तन्निमित्तेन कर्मत्वपरिणतानां जीवेन सहान्योन्यसंमूर्छनं पुतलानां च बंधः । अत्यंतशुद्धात्मोपलम्मो जीवस्य, जीवेन सहात्यन्तविश्लेषः कर्मपुरलानां च मोक्ष इति ।। १०८।। अन्वयार्थ-( जीवाजीवौ भावौ ) जीव और अजीव—दो भाव ( अर्थात् मूल पदार्थ) तथा ( तयोः ) उन दो के ( पुण्यं ) पुण्य, ( पापं च ) पाप, ( आस्त्रवः ) आस्रव, ( संवरनिर्जरबंधाः ) संवर, निर्जरा, बंध ( च ) और ( मोक्ष: ) मोक्ष ( ते अर्थाः भवन्ति ) वह ( नव ) पदार्थ होते टीका-यह, पदार्थों के नाम और स्वरूपका कथन है। जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध, मोक्ष इस प्रकार नव पदार्थोके नाम हैं। उनमें, चैतन्य जिसका लक्षण है ऐसा जीवास्तिक ही ( जीवास्तिकाय ही ) यहाँ जीव है । चैतन्यका अभाव जिसका लक्षण है वह अजीव है : वह ( अजीव ) पाँच प्रकारसे पहले कहा हो है-पुद्गलास्तिक, धर्मास्तिक, अधर्मास्तिक, आकाशास्तिक और कालद्रव्य । यह जीव और अजीव ( दोनों ) पृथक् अस्तित्व द्वारा निष्पन्न होनेसे भिन्न जिनके स्वभाव हैं ऐसे ( दो ) मूल पदार्थ हैं। जीव और पुद्गलके संयोग परिणामसे उत्पत्र होनेवाले सात अन्य पदार्थ हैं। जीवके शुभपरिणाम ( वह पुण्य है ) तथा वे ( शुभ परिणाम ) जिनका निमित्त हैं ऐसे पुद्गलोंके कर्मपरिणाम ( शुभकर्म-रूप ) वह पुण्य है। जीक्के अशुभ परिणाम ( वह पाप है ) तथा वे ( अशुभ परिणाम ) जिनका निमित्त हैं ऐसे पुद्गलोंके कर्मपरिणाम वह पाप है। जीवके
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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