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________________ २६० चद्रव्य - पंचास्तिकायवर्णन मूर्तीमूर्तलक्षणाख्यानमेतत् 1 जे खलु इन्दिय-गेज्झा बिसया जीवेहिं होंति ते मुत्ता । सेसं हवदि अमुत्तं चित्तं उभयं समादि- यदि ।। ९९ ।। ये खलु इन्द्रियग्राह्या विषया जीवैर्भवन्ति ते मूर्ताः । शेषं भवत्यमूर्तं चित्तमुभयं समाददाति ।। ९९ ।। 1 इह हि जीवैः स्पर्शनरसनाघ्राणचक्षुभिरिन्द्रियैस्तद्विषयभूताः स्पर्शरसगंधवर्णस्वभावा अर्था गृह्यन्ते । श्रोत्रेन्द्रियेण तु त एव तद्विषयहेतुभूतशब्दाकारपरिणता गृह्यन्ते । ते कदाचित्स्थूलस्कंधत्वमापन्नाः कदाचित्सूक्ष्मत्वमापन्नाः कदाचित् परमाणुत्वमापन्नाः इन्द्रियग्रहणयोग्यतासद्भावाद् गृह्यमाणा अगृह्यमाणा वा मूर्ता इत्युच्यते । शेषमितरत् समस्तमप्यर्थजातं स्पर्शरसगंधवर्णाभावस्वभावमिन्द्रियग्रहणयोग्यताया अभावादमूर्तमित्युच्यते । चित्तग्रहणयोग्यतासद्भाव भाग्भवति तदुभयमपि, चित्तं ह्यनियतविषयमप्राप्यकारि मतिश्रुतज्ञानसाधनीभूतं मूर्तममूर्त च समाददातीति ।। ९९ ।। - इति सूलिका ममता । अन्वयार्थ - ( ये खुल) जो पदार्थ ( जीवैः इन्द्रियग्राह्याः विषयाः ) जीवोंके इन्द्रियग्राह्य विषय हैं ( ते मूर्ताः भवन्ति ) वे मूर्त हैं और [ शेष ] शेष पदार्थसमूह ( अमूर्त भवति ) अमूर्त है । (चित्तम् ) चित्त ( मन ) (उभयं ) उन दोनोंको [ मूर्त अमूर्त को ] ( समाददाति ) ग्रहण करता है (जानता है ) | टीका- यह, मूर्त और अमूर्तके लक्षणका कथन है । इस लोकमें जीवों द्वारा स्पर्शनेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय और चक्षुरिन्द्रिय द्वारा उनके विषयभूत स्पर्श रस गंध वर्णस्वभाववाले पदार्थ ग्रहण होते हैं और श्रोत्रेन्द्रिय द्वारा वही पदार्थ उसके ( श्रोत्रेन्द्रियके ) विषयहेतुभूत शब्दाकार परिणमित हुए ग्रहण होते हैं । (वे पदार्थ ), कदाचित् स्थूल स्कन्धपनेको प्राप्त होते हुए, कदाचित् सूक्ष्मत्वको प्राप्त हुए और कदाचित् परमाणुपको प्राप्त होते हुए इन्द्रियों द्वारा ग्रहण होते हों या न हों, इन्द्रियों द्वारा ग्रहण होने की योग्यताका ( सदैव ) सद्भाव होनेसे मूर्त कहलाते हैं । स्पर्श-रस-गंध-वर्णका अभाव जिसका स्वभाव है ऐसा शेष अन्य समस्त पदार्थसमूह इन्द्रियों द्वारा ग्रहण होनेकी योग्यताके अभावके कारण 'अमूर्त' कहलाता है । वे दोनों (पूर्वोक्त दोनों प्रकारके अर्थात् मूर्त अमूर्त पदार्थ ) चित्त ( मन ) द्वारा ग्रहण होनेकी योग्यताके सद्भाववाले हैं, चित्त-जो कि अनियत विषयवाला, अप्राप्यकारी और मतिश्रुतज्ञानको साधनभूत है वह मूर्त तथा अमूर्तको ग्रहण करता है ( जानता है ) ॥९९॥ इस प्रकार चूलिका समाप्त हुई ।
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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