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________________ पंचास्तिकाय प्राभृत टीका--यह, कर्तृत्व और शोनापकी का खाका उपसंहार है। इसलिये ( पूर्वोक्त कथनसे ) ऐसा निश्चित हुआ कि--कर्म निश्चयसे अपना कर्ता है, व्यवहारसे जीव भावका कर्ता हैं, जीव भी निश्चयसे अपने भावका कर्ता है, व्यवहारसे कर्मका कर्ता है। जिस प्रकार यहाँ दोनों नयोंसे कर्म कर्ता है, उसी प्रकार एक भी नयसे वह भोक्ता नहीं है। किसलिये? क्योंकि उसे चैतन्यपूर्वक अनुभूतिका सद्भाव नहीं है। इसलिये चेतनपनेके कारण मात्र जीव ही कर्मफलका—कथंचित् आत्माके सुखदुःखपरिणामोंका और कथंचित् इष्टानिष्ट विषयोंका-भोक्ता प्रसिद्ध है ।।६८।। संस्कृत तात्पर्यवृत्ति गाथा ६८ अथ कर्तृत्वभोक्तृत्वोपसंहार: कथ्यते । तम्हा-यस्मात्पूर्वोक्तनविभागेन जीवकर्मणोः परस्परोपादानकर्तृत्वं नास्ति तस्मात्कारणात्, कम्म कत्ता-कर्म कर्तृ भवति । केषां । निश्चयेन स्वकीयभावानां व्यवहारेण रागादिजीवभावानां जीवोपि व्यवहारेण द्रव्यकर्मभावानां निश्चयेन स्वकीयचैतन्यभावानां । कथं भूतं सत्कर्म स्वकीयभावानां कर्तृ भवति । संजुदा-संयुक्तं, अध-अथो। केन संयुक्तं । भावेण मिथ्यात्व रागादिभावेन परिणामेन, जीवस्य-जीवस्य जीवोपि कर्मभावेन संयुक्त इति भोक्ता दु-भोक्ता पुन: । हवदि भवति । कोसौ । जीवो-निर्विकारचिदानंदैकानुभूतिरहितो जीवः । केन कृत्वा । चेदगभावेण-परमचैतन्यप्रकाशविपरीतेनाशुद्धचेतकभावेन । किं भोक्ता भवति । कम्मफलं. शुद्धबुद्ध कस्वभावपरमात्मतत्त्वभावनोत्पत्रं यत्सहजशुद्धपरमसुखानुभवनफलं तस्माद्विपरीतं सांसारिकसुखदुःखानुभवनरूपं शुभाशुभकर्मफलमिति भावार्थ: ।।६८।। एवं पूर्वगाथा कर्मभोक्तृत्वमुख्यत्वेन, इयं तु गाथा कर्मकर्तृत्वभोक्तृत्वयोरुपसंहारमुख्यत्वेनेति गाथाद्वयं गतं । हिन्दी तात्पर्यवृत्ति गाथा ६८ उत्थानिका-आगे कर्ता भोक्तापनेका कथन संकोच करते हैं । अन्ययसहित सामान्यार्थ-( तम्हा) इसलिये ( कम्म) द्रव्यकर्म ( जीवस्स ) जीवके [ भावेण संजुदो] भावसे संयोग होता हुआ [हि] निश्चयसे [कत्ता] अपनी कर्मरूप अवस्थाओंका कर्ता है ( अध) ऐसे ही जीव भी द्रव्यकर्मके उदयके निमित्तसे अपने रागादि भावों का कर्ता है (दु) परंतु [जीवो] जीव अकेला ( चेदगभावेण) अपने अशुद्ध चेतनभावसे ( कम्मफलं) कर्मोक फलका [ भोत्ता] भोगनेवाला ( हवदि) हो जाता है । विशेषार्थ-क्योंकि पहले यह कह चुके हैं कि निश्चयसे जीव द्रव्य कर्मका उपादान कारण नहीं है और द्रव्यकर्म जीवके भावका उपादान कारण नहीं है इसलिये द्रव्यकर्म उपादानरूप अपने ज्ञानावरणादि परिणामोंका कर्ता है । व्यवहारसे जीवके रागादि भावोंका
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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