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________________ पंचास्तिकाय प्राभृत १४९ वास्तवमें द्रव्य गुणोंका समुदाय है । गुण यदि समुदायसे अन्य हों तो समुदाय कैसा क्या रह जायगा अर्थात् कुछ भी न रह जायगा। इस प्रकार यदि गुणोंका द्रव्यसे भिनत्व हो तो, द्रव्यका अभाव होता है ।।४४।।। संस्कृत तात्पर्यवृत्ति गाथा-४४ अथ द्रव्यस्य गुणेभ्य एकांतेन प्रदेशास्तित्वभेदे सति गुणानां च द्रव्याद्भेदे सति दोषं दर्शयति–जदि हवदि दव्वमण्णं-यदि चेत् द्रव्यमन्यद्भवति । केभ्यः । गुणदो हि-गुणेभ्यः, गुणा य दव्वदो अण्णे गुणाश्च द्रव्यतो यद्यन्ये भिन्ना भवन्ति । तदा किं दूषणं ? दव्वाणंतियगुणेभ्यो द्रव्यस्य भेदे सत्येकद्रव्यस्यापि आनन्त्यं प्राप्नोति । अहवा दब्वाभावं पकुव्वंति– अथवा द्रव्यात्सकाशाद्यद्यन्ये भिन्ना गुणा भवन्ति तदा द्रव्यस्याभावं कुर्वतीति । तद्यथा-गुणा: साश्रया वा निराश्रया वा । साश्रयपक्षे दूषणं दीयते । अनंतज्ञानादयो गुणास्तावत् क्वचिच्छुद्धात्मद्रव्ये समाश्रिताः यत्रात्मद्रव्ये समाश्रिताः तदन्यद्गुणेभ्यश्चेत् पुनरपि क्वचिज्जीवद्रव्यांतरे समाश्रितास्तदप्यन्यद्गुणेभ्यश्चेत् पुनरपि क्वचिदात्मद्रव्यांतरे समाश्रिताः । एवं शुद्धात्मद्रव्यादनंतज्ञानादिगुणानां भेदे सति भवति शुद्धात्मद्रव्यानंत्यं । अथोपादेयभृतपरमात्मद्रव्ये गुणगुणिभेदे सति द्रव्यानंत्यं व्याख्यातं तथा हेयभूताशुद्धजीवद्रव्येपि पुद्गलादिष्वपि योजनीयं । अथवा गुणगुणिभेदैकांते सति विवक्षिताविवक्षितैकैकगुणस्य विवक्षिताविवक्षितैकैकद्रव्याधारे सति भवति द्रव्यान्न्यं द्रव्यात्सकाशान्निराश्रयभिन्नगुणानां भेदे द्रव्याभावः कथ्यते, गुणानां समुदायो द्रव्यं भण्यते गुणसमुदायरूपद्रव्याद्गुणानां भेदैकांते सति गुणसमुदायरूपं द्रव्यं क्वास्ति ? न क्वापीति भावार्थ: ।।४४।। हिन्दी तात्पर्यवृत्ति गाथा-४४ उत्थानिका-आगे यदि एकांतसे ऐसा माना जाय कि द्रव्यका गुणोंके साथ प्रदेशोंकी अपेक्षा भेद है या गुणोंका द्रव्यके साथ भेद है तो दोष आयेगा ऐसा बताते हैं। ___ अन्वयसहित सामान्यार्थ-( जदि) यदि ( दव्वं) द्रव्य (गुणदो) गुणसे ( अण्णं) अन्य ( हवदि) होवे (य) और ( गुणा य) गुण भी ( दव्यदो) द्रव्यसे ( अण्णं) भिन्न हो तो ( दवाणंतियं) द्रव्योंके अनंतपनेको ( अथवा ) अथवा ( दव्याभावं ) द्रव्यके नाशको ( पकुव्वति) करते हैं। ___ विशेषार्थ-प्रदेशोंकी अपेक्षा भी यदि द्रव्यसे गुण अलग अलग हों तो जो अनंतगुण द्रव्य में एक साथ रहते हैं वे अलग अलग होकर अनंत द्रव्य हो जायेंगे और द्रव्यसे सब गुण भिन्न होगए तब द्रष्यका नाश हो जावेगा। यहाँ पूछते हैं कि गुण किसीके आश्रय या आधार रहते या वे आश्रय बिना होते हैं ? यदि वे आश्रयसे रहते हैं ऐसा कोई माने और
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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