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________________ १४० षड्डव्य - पंचास्तिकायवत हिन्दी तात्पर्यवृत्ति गाथा - ३ उत्थानिका- आगे अवधिज्ञानको कहते हैं अन्वयसहित सामान्यार्थ - ( तहेव ) तैसे ही ( ओहिं) अवधिज्ञानको ( घेप्पदु ) ग्रहण करो (देश) देशावधि ( च परमं ) और परमावधि ( ओहिसव्वं ) और सर्वावधि ( तिणिवि ) तीनों ही (णियमा ) नियमसे (गुणेण ) सम्यक्त्वादि गुणसे होती हैं ( तहा ) तथा ( भवेण ) भवके द्वारा (यिदं ) नियमसे (देसं ) देशावधि होती है । विशेषार्थ - जो अवधिज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशम होने पर मूर्तिक वस्तुको प्रत्यक्ष रूप से जानता है वह अवधिज्ञान है। जैसे पहले श्रुतज्ञानको उपलब्धि भावना तथा उपयोगको अपेक्षा तीन भेदसे कहा था वैसे अवधिज्ञान भावनाको छोड़कर उपलब्धि का तथा उपयोग स्वरूप है। अवधिज्ञानकी शक्ति सो उपलब्धि है, चेतनकी परिणतिका उधर झुकना सो उपयोग है तथा उसके तीन भेद और भी जानां देशावधि, परमावधि, सर्वावधि किन्तु इन तीनमेंसे परमावधि और सर्वावधि ज्ञान उन चरमशरीरी मोक्षगामी मुनियोंके होता है जो चैतन्य भावके उछलनेसे पूर्ण व आनन्दमय परम सुखामृत रसके आस्वादरूप परम समरसी भावमें परिणमन कर रहे हैं। जैसा कि वचन है "परमोही सव्वोही चरमशरीरस्य विरदस्स" ये तीनों ही अवधिज्ञान विशेष सम्यग्दर्शन आदि गुणोंके कारण नियमसे होते हैं तथा जो भवप्रत्यय अवधि है अर्थात् जो देव नारकियोंके जन्मसे होनेवाली अवधि है वह नियमसे देशावधि ही होती है यह अभिप्राय है ।। ३ ।। संस्कृत तात्पर्यवृत्ति गाथा - ४ विउलमदी पुण णाणं अज्जवणाणं च दुविह मणणाणं । एदे संजमलद्धी उवआगे अप्पमत्तस्स ||४॥ I अयमात्मा पुनः मन:पर्ययज्ञानावरणीयक्षयोपशमे सति परकीयमनोगतं मृतं वस्तु यत्प्रत्यक्षेण जानाति तन्मन:पर्ययज्ञानं । तच्च कतिविधं ? विउलमदी पुण गाणं अज्जवणाणं च दुविहं मणणाणं ऋजुमतिविपुलमतिभेदेन द्विविधं मन:पर्ययज्ञानं तत्र विपुलमतिज्ञानं परकीयमनोवचनकायगतमर्थं वक्रावक्रं जानाति, ऋजुमति प्राञ्जलमेव । निर्विकारात्मोपलब्धिभावनासहितानां चरमदेहमुनीनां विपुलमतिर्भवति । एदे संजमलद्धी- एतौ मन:पर्ययाँ संयमलब्धी उपेक्षासंयमे सति लब्धिर्ययोस्तौ संयमलब्धी मन:पर्ययौ भवतः । तौ च कस्मिन् काले समुत्पद्येते । उवओगे-उपयोगे विशुद्धपरिणामे । कस्य ? अप्पमत्तस्स वीतरागात्मतत्त्वसम्यक् श्रद्धानज्ञानानुष्ठानभावनासहितस्य "विकहा तहा कसाया इंदिय शिक्षा य तहेव पणओ य । चदु चदुपण मेगेगं "
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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