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________________ -128:2-18<] १. धर्मोपदेशामृतम् तं ततो वाह्यमनन्तभदम् । 126) उक्त जिनैर्द्वादशमेव तस्मिनुपादेयतया चिदात्मा ततः परं हेयतयाम्यधायि ॥ १२६ ॥ 127 ) अल्पायुषामत्पधियामिदानीं कुतः समस्तश्रुतपावशतिः । तत्र मुक्ति प्रति बीजमाश्रमभ्यस्यतामात्महितं प्रयमात् ॥ १२७ ॥ 128 ) निक्यो जिनेन्द्रस्तद्तुलवचसां गोचरे ऽर्ये परोसे कार्थः सो ऽपि प्रमाणं वदत किमपरेपालकोलाहले । अवलोकितानाम् ॥ १२५ ॥ जिनैः गणधर देवैः । द्वादशभेदम् अहं श्रुतम् उर्फ कथितम् । ततः । द्वादशाहादुजाड्यम् अनेकभेदम् । तस्मिन् द्विधाश्रुतेषु (?)। उपादेयतया चिदात्मा वर्तते । अभ्यधायि अकमि । ततः भ्रात्मनः सकाशात् । परं परवस्तु हेयतया अभ्यधायि जिनः कथितवान् ॥ १२६ ॥ तत्तस्मात्कारणात् । इदानीम् अल्पायुषाम् अल्पधियां मनुष्याणाम् समस्तपाटशक्तिः कुतः भवति । अत्र संसारे प्रयत्नात् किं प्रति बीजमात्रम् आत्महितं श्रुतम् अभ्यस्यताम् ॥ १२७॥ भो भो भव्याः जिनेन्द्रः निश्वेतव्यः । तस्य जिनेन्द्रस्य । अतुलवचसां गोचरे परोक्षे अर्थे निश्वयः सोऽपि विषयः प्रमाणं कार्यम् । भो लोकाः । इह आत्मति उपस्थताय सत्याम् अपरेण आल-मिथ्या कोलाइले पृथा किम् । वदल भो भव्याः भो समयपथस्वानुभूतिप्रबुद्धाः यस्वरूपसे निर्दिष्ट किया गया है ॥ विशेषार्थ - मतिज्ञानके निमिससे जो ज्ञान होता है उसे श्रुतज्ञान कहते हैं । इस श्रुतके मूलमें दो मेद हैं- अंगप्रविष्ट और मंगवाच । इनमें अंगप्रविष्ट निम्म बारह मेद हैं - १ आचारांग २ सूत्रकृतांग ३ स्थानांग ४ समवायांग ५ व्याख्याप्रज्ञत्वंग ६ ज्ञातुधर्मकभांग ७ उपासकाध्ययनांग ८ अन्तकृद्दशांग ९ अनुधरोपपादिकदशांग १० प्रश्नव्याकरणांग ११ विपाकसूत्रांग और १२ दृष्टिवादांग । इनमें दृष्टिबाद भी पांच प्रकारका है- १ परिकर्म २ सूत्र ३ प्रथमानुयोग ४ पूर्वगत और ५ चूलिका । इनमें पूर्वगत के भी निम्न चौदह मेद हैं- १ उत्पादपूर्वं २ अमायणीपूर्व ३ वीर्यानुप्रवाद ४ अस्ति नास्तिप्रवाद ५५ ज्ञानप्रवाद ६ सत्यप्रवाद ७ आत्मप्रवाद ८ कर्मप्रवाद ९ प्रत्याख्याननामधेय १० विद्यानुप्रवाद १.१ कल्याणनामधेय १२ प्राणावाय १३ क्रिमाविशाल और १४ लोकबिन्दुसार । अंगनाथ दशबैकालिक और उत्तराध्ययन आदिके भेदसे अनेक प्रकारका है। फिर भी उसके मुख्यतासे निम्न चौदह मेद बतलाये गये हैं- १ सामायिक २ चतुर्विंशतिस्तव ३ बन्दना ४ प्रतिक्रमण ५ वैनयिक ६ कृतिकर्म ७ दशवैकालिक ८ उत्तराध्ययन ९ कल्पव्यवहार १० कल्प्याकल्प्य ११ महाकम्प १२ पुण्डरीक १३ महापुण्डरीक और १४ निपिद्धिका (विशेष जिज्ञासा के लिये षट्स्वागम - कृतिअनुयोगद्वार (पु. ९) ४. १८७ - २२४ देखिये) । इस समस्त ही श्रुतमें एक मात्र आत्माको उपादेय बतलाकर अन्य सभी पदार्थोंको हेय बतलाया गया है । श्रुतके अभ्यासका प्रयोजन भी यही है, अन्यथा ग्यारह अंग और नौ पूर्वोका अभ्यास करके भी द्रव्यलिंगी मुनि संसारमें ही परिश्रमण किया करते हैं ।। १२६ । वर्तमान कालमें मनुष्योंकी आयु अरूप और बुद्धि अतिशय मन्द हो गई है । इसीलिये उनमें उपर्युक्त समस्त श्रुतके पाठकी शक्ति नहीं रही है। इस कारण उन्हें यहां उतने ही श्रुतका प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करना चाहिये जो मुक्तिके प्रति बीजभूत होकर आत्माका हित करनेवाला है ॥ १२७ ॥ हे भव्य जीवो ! आपको जिनेन्द्र देवके विषय में निश्चय करना चाहिये और उसके अनुपम वचनोंके विषयभूत परोक्ष पदार्थके विषय में उसीको प्रमाण मानना चाहिये। दूसरे व्यर्थके कोलाहल्से क्या प्रयोजन सिद्ध होगा, यह आप ही बतलावें । अतएव छद्मस्थ ( अस्पज्ञ ) अवस्थाके विद्यमान १म किमपरेराको काहलेन, ब. किमपरेको आके २ अक्ष अपरैः माल्कोव्हकेन । पद्मनं० ७
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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