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________________ पद्मनम्दि-पश्चर्षिशतिः 8128 १-२२123) विहाय व्यामोह घनसदमतम्यादिविषये कुरुध्वं तत्तूर्ण किमपि निजकार्य बत सुधार । न येवं जन्म प्रमषसि सुनृत्यादिघटना पुनः स्थान स्यावा किमपरवषोडम्बरशतः॥१२३ 124) वाचस्तस्य प्रमाणं यह जिनपतिः सर्वविद्वीतरागो रागद्वेषादिदोषैरुपहर्तमनसो नेतरस्यानृतस्यात् । पतशिश्चित्य चिचे धयत बत बुधा विश्वतस्योपलब्धी मुक्तर्मूलं तमेकं भ्रमत किमु बहुष्पन्धवर पथेषु ॥ १२४ ।। 125) यः फल्पयेत किमपि सर्वविदो ऽपि वाचि संदिह तत्वमसमञ्जसमात्मबुया। से पविणो विचरतां मुश्शेक्षितानां संख्या प्रति प्रविदधाति स वावमाधः ॥ १२५ ॥ चरितम् ॥ १२३ ॥ पत इति वेवे । मो बुधाः भो लोकाः। भपरस्यासम्बर के बचनसहनः किम् । तूर्ण शीघ्रम् । तस्कि मपि निजकार्य कुरुष्यम् । येन कर्मणा । इदं प्रन्म संसारः। न प्रभवति । धनसदनतन्यादिविषये म्यामोहं विहाय त्यक्त्वा । पुनः सनृत्यादिघटना पुनः स्यात् भवेत् । वान स्थान् म भवेत् ॥ ११॥ इह संसारे। तस्य वाचः प्रमाण श्रेष्ठम् । यः जिनपतिः मवति । यः सर्वविति ।यो वीतरागो भवति । इतरस्य देवस्य वाचः प्रमार्ग न स्यात् म भवेत् । कस्मात् । अमृतत्वात् असत्यस्वात् । विलक्षणस्य कुवेवस्य । रागद्वेषादिदोषः फुस्वा उपहृतमनसः रागद्वेषैः पीडितचित्तस्य । बत इति आहे । भो बुधाः एतपूर्वोकम् । विते निचित्य चिते स्याप्य । विश्वतत्वोपसन्धौ सत्याम् । एक तम् आत्मानं मुक्तेमूलं श्रयत नियत । बहुषु दुःपयेषु अन्धक्त् किमु भ्रमत ॥ १२४ ॥ यः मूर्खः आत्मबुया कृत्वा । तत्वं प्रति संदिस्य संदई गत्वा । सर्वविदः वाचि सर्वज्ञस्य वचने । किमपि असमझर्स वैपरीयं । फस्पयेत् असत्सं विचारयेत् । स मूर्खः अन्धः। से आकाशे। विचरतो गच्छताम् । पंत्रिगी पक्षिणाम् । संख्या प्रति । पार्द प्रविदयाति वादे करोति । किलक्षणामा पनिणाम् । सुदृशेक्षिताना दृष्टियुफेन जीवन यह सब मोहकी महती लीला है ।। १२२ ।। हे पण्डितजन ! धन, महल और शरीर आदिके विषय में ममत्व बुद्धिको छोड़कर शीघ्रतासे कुछ भी. अपना ऐसा कार्य करो जिससे कि यह जन्म फिरसे न प्राप्त करना पड़े। दूसरे सैकड़ों वचनोंके समारम्भसे सुम्हारा कोई भी अभीष्ट सिद्ध होनेवाला नहीं है । यह ओ तुम्हें उत्तम मनुष्य पर्याय आदि स्वहितसाधक सामग्री प्राप्त हुई है वह फिरसे प्राप्त हो सकेगी अथवा नहीं प्राप्त हो सकेगी, यह कुछ निश्चित नहीं है । अर्थात् उसका फिरसे प्राप्त होना बहुत कठिन है ॥ १२३ ।। यहां जो जिनेन्द्र देव सर्वज्ञ होता हुआ राग-द्वेषसे रहित है उसका वचन प्रमाण (सत्य) है। इसके विपरीत जिसका अन्तःकरण राग-द्वेषादिसे दूषित है ऐसे अन्य किसीका वचन प्रमाण नहीं हो सकता, कारण कि वह सत्यतासे रहित है। ऐसा मनमें निश्चय करके हे बुद्धिमान् सज्जनो ! जो सर्वज्ञ हो जानेसे मुक्तिका मूल कारण है उसी एक जिनेन्द्र देवका आप लोग समस्त तत्वोंके परिज्ञानार्थ आश्रय करें, अन्धेके समान बहुत-से कुमा!में परिभ्रमण करना योग्य नहीं है ।। १२४ ।। जो सर्वशके मी वचनमें सन्दिग्ध होकर अपनी बुद्धिसे सत्त्वके विषयमें अन्यथा कुछ कल्पना करता है वह अज्ञानी पुरुष निर्मल नेत्रोंवाले व्यक्ति द्वारा देखे गये माकाशमें विचरते हुए पक्षियोंकी संख्याके विषयमें विवाद करनेवाले अन्धेके समान आचरण करता है ॥ १२५ । जिन देवने अंगभुतके बारह तथा अंगबाधके अनन्त भेद बतलाये हैं । इस दोनों ही प्रकारके श्रुतमें चेतन आत्माको प्रामास्वरूपसे तथा उससे भिन्न पर पदार्थोंको १ उपदत।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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