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________________ -981-२८] ६.धर्मोपदेशामृतम् प्राप्ते ते अतिनिर्मले अपि पर स्याता न येनोमिते स्वोचैकफलप्रदेस व कर्यनलाध्यते संयमः॥१७॥ 98) कर्ममलविलयहेसोर्योधरशा तप्यते सपा मोक्तम् । व वेधा द्वादशधा जम्माम्बुधियानपात्रमिदम् ॥ ९८ ॥ माप्तवचःश्रुतेः सकाशात् स्थितिः दुर्लभा । तस्याः स्थितेः । च पुनः : रग्बोधने दुर्लभे । ते वे भपि सम्बोधने प्रतिनिर्म प्राप्ते सति । येन संयमेन । उजिसवे के 1 परम् । स्त्रोकफलप्रदे । न स्याता न भवेताम् । च पुनः । म संयमः कप म झाप्यते । अपि तु काप्यते ॥ ९७ ॥ तत् तपः प्रोक्तम् । यत्तपः । बोधरशा ज्ञाननेत्रेण । कर्ममलविलपहेतोः तप्यते । इदं तपः देवा । मिलना कठिन है, उत्तम जाति आदिके प्राप्त हो जानेपर जिनवाणीका श्रवण दुर्लभ है, जिनवाणीका श्रवण मिलनेपर भी बड़ी आयुका प्राप्त होना दुर्लभ है, तथा उससे भी दुर्लभ सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान है । यदि अत्यन्त निर्मल वे दोनों भी प्राप्त हो जाते हैं तो जिस संयमके विना वे स्वर्ग एवं मोक्षरूप अद्वितीय फलको नहीं दे सकते हैं वह संयम कैसे प्रशंसनीय न होगा ! अर्थात् वह अवश्य ही प्रशंसाके योग्य है ॥९७ ।। सम्यग्ज्ञानरूपी नेत्रको शरण करनेवाले साधुके द्वारा जो कर्मरूपी मैलको दूर करने के लिये तपा जाता है उसे तप कहा गया है । वह बाध और अभ्यन्तरके भेदसे दो प्रकारका तथा अनशनादिके मेदसे बारह प्रकारका है । यह तप जन्मरूपी समुद्रसे पार होनेके लिये जहाजके समान है | विशेषार्थ-जो कोका क्षय करने के उद्देशसे तथा जाता है उसे तप कहते हैं। वह बाप और अभ्यन्तरके भेदसे दो प्रकारका है । जो तप शप द्रव्यकी अपेक्षा रखता है तथा दूसरों के द्वारा प्रत्यक्षमें देखा जा सकता है वह बाध तप कहलाता है। उसके निम्न छह भेद हैं। १ अनशन – संयम आदिकी सिद्धिके लिये चार प्रकारके (अन्न, पेय, खाद्य और लेप) के आहारका परित्याग करना । २ अवमौदर्य - बत्तीस पास प्रमाण स्वाभाविक आहारमेंसे एक-दो-तीन आदि ग्रासोको कम करके एक मास तक ग्रहण करना । ३ वृत्तिपरिसंख्यान - गृहप्रमाण तथा दाता एवं भाजन आदिका नियम करना । गृहप्रमाण --जैसे आज मैं दो घर ही जाऊंगा । यदि इनमें आहार प्राप्त हो गया तो ग्रहण करंगा, अन्यथा ( दोसे अधिक घर जाकर ) नहीं । इसी प्रकार दाता आदिके विषयमें भी समझना चाहिये । ४ रसपरित्याग-दूध, दही, घी, तेल, गुड़ और नमक इन छह रसोंमेंसे एक-दो आदि रसोंका त्याग करना अथवा तिक्त, कटुक, कषाय, आम्ल और मधुर रसमिसे एक-दो आदि रसोंका परित्याग करना । ५ विविक्तशय्यासन — जन्तुओंकी पीड़ासे रहित निर्जन शून्य गृह आदिमें शय्या (सोना) या आसन लगाना । ६ कायक्लेश --- धूप, वृक्षमूल अथवा खुले मैदानमें स्थित रहकर ध्यान आदि करना । जो तप मनको नियमित करता है उसे अभ्यन्तर तप कहते हैं । उसके भी निन्न छह भेद हैं । १ प्रायश्चित्तप्रमादसे उत्पन्न हुए दोषोंको दूर करना। २ विनय - पूज्य पुरुषों में आदरका भाव रखना । ३ वैयावृत्य-शरीरकी चेष्टासे अथवा अन्य द्रव्यसे रोगी एवं वृद्ध आदि साधुओंकी सेवा करना । ४ स्वाध्याय - आलस्यको छोड़कर ज्ञानका अभ्यास करना । वह वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेशके भेदसे पांच प्रकारका है-१ निर्दोष प्रन्थ, अर्थ और दोनोंको ही प्रदान करना इसे वाचना कहा आता है । २ संशयको दूर करनेके लिये दूसरे अधिक विद्वानोंसे पूछनेको पृच्छना कहते हैं । ३ जाने हुए पदार्थकम मनसे विचार करनेका नाम अनुप्रेक्षा है। ४ शुद्ध उच्चारणके साथ पाठका परिशीलन करनेका माम नाम है। ५ धर्मकथा आदिके अनुष्ठाचको धर्मोपदेश कहा जाता है । ५ युसर्ग ---- अहंकार और
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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