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________________ -85:१-८५] १. धमारपेशामृतम् अमलविपुलविवेकसमा सा क्षमादौ शिवपथपविकाना सत्सहापत्वमेति ॥ 88) धामन्यपुण्यतरसगुणोपशाला पत्रप्रसूननिचितोऽपि फलाम्यवस्था । याति झर्य मणत पव घमोनकोप दावानलात् त्यसव त यतयो ऽतिदूरम् ॥ ८ ॥ 84) तिष्ठामो षयमुजवलेन मनसा रागादिवोचोजिसताः लोक किंचिदपि स्वकीयहदये खेच्छाधरो मम्यताम् । साध्या शुद्धिरिहात्मनः शमषतामत्रापरेण विषा मित्रेणापि किमु खषेष्टितफल स्वार्थी स्वयं लप्स्यते ॥ ४॥ 85) दोषामाधुष्य लोके मम भवतु सुखी बुर्जनमेवनार्थी तत्सर्वस राहीस्वा रिपरथ सहसा जीवितं स्थानमन्पः। मध्यस्यस्पमेधासिलामेह जगज्जायतां सौल्यराशिः मसो माभूदसौख्यं कथमपि भाविनः कस्यचिस्पूस्करोमि ॥ ८॥ मूर्खअनैः श्लोक (1) तेन कृता बाधा लोकतयाथों । आशा कठोरपवनम् । हास्यअप्रियअहितकरीबचनविद्यमानेऽपि सति ॥८३ ॥ धामण्यपुण्यतमः भ्रमणस्य भावः श्रामण्यं श्रमण्यपद मुनिपदम् एव पक्षः। फलानि अवरवा क्षणतः एव र मावि। किलक्षणः तरुः । उच्चगुणोघशाखापत्रप्रसूननिधितोऽपि गुणशाखापत्रपुष्पसवितः पक्षः। घमोपकोपदावानात् बहुमकोषाः सकाशात् । विनाश याति । भो यतयः तं कोधम् । अतिर लजत ॥ ८३३) कधिन्मुनिः बैराग्यं चिन्तयति । ववमुखपत्र मनसा तिष्ठामः । किंलक्षणाः वयम् । रागाविदोषोजिमताः रागादिदोषरहिताः । खेरछाचरः लोकः स्वकीयहरये विविवापि मन्यताम् । इह जगति विषये । शमवता मुनीनाम् । पात्मनः शुद्धिः साध्या । अत्रापि मुनी। अपरेण निषा शत्रुणा कार्यम् । मित्रेणापि किमु स्वाथ खप्रयोजनम् । खचेष्टितफलम् आत्मना उपार्जितम् । स्वर्य लप्स्यते यास्मना प्राप्यते ॥४॥ मुनिः उदास(?) बिन्तयति। दुर्जनः लोके मम दोषान् माधुष्प कथयित्वा सुखी भवत्। यदि देवमाषी बुर्जनः सदा तत्सर्वस समस्तद्रय गृहीत्वा सुखी भवतु । अथ रिपुः सहसा जीवितं गृहीत्वा सुखी भवतु। अन्यः जनः स्थाभ गृहीत्वा सुखी भवतु । तु पुनः । बई मध्यस्थः । इह मयि अखिलं अगत् सौख्यराधिआयताम् । मत्तः सकाचात् कस्पचित् भनिनः जीवस । असौख्वं निर्मल व विपुल शानके धारी साधुक्म मन क्रोधादि विकारको नहीं प्राप्त होता है उसे उत्तम क्षमा कहते हैं। वह मोक्षमार्ग में चलनेवाले पथिक जनों के लिये सर्वप्रथम सहायक होती है ॥ ८२ ।। मुनिधर्मसपी पवित्र पक्ष उन्नत गुणोंके समूहरूप शाखाओं, पसों एवं पुष्पोंसे परिपूर्ण होता हुआ भी फलोंको न देकर अतिशय तीन कोधरूपी दावामिसे क्षणभरमें ही नाशको प्राप्त हो जाता है । इसलिये हे मुनिजन ! आप उस कोषको दूरसे ही छोड़ दें ।। ८३॥ हम लोग रागादिक दोषोंसे रहित होकर विशुद्ध मनके साथ स्थित होते हैं। इसे यथेच्छ आचरण करनेवाला जनसमुदाय अपने हृदयमें कुछ भी माने । लोकमें शान्तिके ममिलापी मुनिजनों के लिये अपनी आत्मशुद्धिको सिद्ध करना चाहिये । उन्हें यहां दूसरे शत्रु अभदा मित्रसे भी क्या प्रयोजन है ! यह (शत्रु या मित्र) तो अपने किये हुए कार्यके अनुसार स्वयं ही फल प्राप्त करेगा ॥ ८४ ।। यदि दुर्जन पुरुष मेरे दोषोंकी घोषणा करके सुखी होता है तो हो, यदि धनका अभिलाषी पुरुष मेरे सर्वस्वको ग्रहण करके सुली होता है तो हो, यदि शत्रु मेरे जीवनको ग्रहण करके सुखी होता है तो हो, यदि दूसरा कोई मेरे खानको प्रहण करके सुखी होता है तो हो, और जो मध्यस्थ है- राग-द्वेषसे रहित है-यह ऐसा ही मध्यस बना रहे। र भकश चिते। २म समाजनभूजनलोक शिन बार, म.साचनमूमजन गोलीन ना गाया।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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