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________________ -79: १-७९] १. धर्मोपदेशामृतम् । २३ 76) बहुभिरपि किमन्यैः प्रस्तरै रत्नसहर्षपुषि जनितखेदैर्भारकारित्वयोगास् । हतदुरिततमोमिथायरत्नेरनलिभिरपि फुरुतात्मालंकृति दर्शनाधैः ॥ ६ ॥ 77) जति स्वखगिहा मेरी सकलमलघिमुक्त पर्शनं यद्विना स्यात् । मतिरपि कुमतिर्नु दुश्चरि चरित्र भवति मनुजसम्म प्राप्तममाप्तमेव ॥ ७ ॥ 78) भवभुजगनागदमनी दुःखमहादायशमनजलवृष्टिः। मुक्तिसुखामृतसरसी जयति गादित्रयी सम्यक ॥ ७८॥ 79) यचनविरचितैयोत्पद्यते भेदबुद्धिडंगवगमचरित्राण्यात्मनः स्वं स्वरूपम् । अनुपचरितमेतश्चेतनैकस्वभावं व्रजति विषयभावं योगिनो योगः ॥ ७९ ॥ त्रिभिः संयुतैः सिद्धिः । एव निश्चयेन ॥ ५५ ॥ भो यतिवराः । अन्यैः बहुभिः रत्नसंज्ञैरपि कि प्रयोजनम् । किलक्षणे रणसंझेः । प्रस्तरैः पाषाणमयैः । पुनः भारकारिरवयोगात् भारस्वभावात् । वपुषि शरीरे । जनितनेदैः उत्पादितखेदैः । इति हेतोः । भो मुनयः । त्रिभिः चारनैः दर्शनायैः । आत्मानं अलंकृतं मण्डितं कुरुत । किंलक्षणैः दर्शनायैः । हतदुरिततमोभिः स्फेटितपापैः ॥ ७६ ॥ वर्शनं जयति । किलक्षणं दर्शनम् । सुखनिधानम् । पुनः किलक्षणम् । मोक्षक्षकवीजम् । पुनः किलक्षण दर्शनम् । सकरमालविमुक्त मलरहितम् । यद्विना येन दर्शनेन विना मतिरपि कुमतिः । येन र्शनेन विना चरित्र दुखरित्रम् । पुनः येन दर्शनेन विना मनुजजन्म मनुष्यजन्म। प्राप्तम् अपि अप्राममेव निश्चयेन ॥ ७॥ सम्यक् निश्चयेन । गादित्रयी जयति । किलक्षणा गादित्रयी। भवभुजगनागदमनी संसारसपेस्फेटने औषधिः । पुनः किलक्षणा रगादित्रयी। दुःखमहादाकशमनजलवृष्टिः दुःखाग्निशमने जलबष | पुनः किलक्षणा त्रयी । मुस्किसुरक्षामृतसरसी मुक्तिसुरवामृतसरोवरी । त्रयी जयति ॥॥ भेदबुद्धिर्भेदविज्ञान बुद्धिः । वचनविरचिता उत्पद्यते एवं सुगनगमचरित्राणि आस्मनः खं स्वरूपम् अस्ति । किंलक्षण स्वरूपम् । अनुपचरितम् उपचाररहितम् । पुनः एतत्स्वरूपं चेतनेकखभावम् । योगिना योगदऐः विषमभावं गोचरभावं प्रगति योगीश्वरशान एकवामें ही प्राप्त हो सकती है 11 ७५ || 'रत्न' संज्ञाको धारण करनेवाले अन्य बहुत-से पत्थरों से क्या लाभ है ? कारण कि भारयुक्त होनेसे उनके द्वारा केवल शरीरमें खेद ही उत्पन्न होता है । इसलिये पापरूप अन्धकारको नष्ट करनेवाले सम्यग्दर्शनादिरूप अमूल्य तीनों ही सुन्दर रनोंसे अपनी आत्माको विभूषित करना चाहिये । ७६ ॥ जिस सम्यग्दर्शनके विना ज्ञान मिथ्याज्ञान और चारित्र मिथ्याचारित्र हुआ करता है वह सुखका स्थानभूत, मोक्षरूपी वृक्षका अद्वितीय बीजस्वरूप तथा समस्त दोषोंसे रहित सम्यग्दर्शन जयवन्त होता है । उक्त सम्यग्दर्शनके विना प्राप्त हुआ मनुष्यजन्म भी अप्राप्त हुएके ही समान होता है [ कारण कि मनुष्यजन्मकी सफलता सम्यग्दर्शनकी प्राप्तिमें ही हो सकती है, सो उसे प्राप्त किया नहीं है ] ॥ ७७ ॥ओ सम्यग्दर्शन आदि तीन रन संसाररूपी सर्पका दमन करनेके लिये नागदमनीके समान हैं, दुखरूपी दावानलको शान्त करनेके लिये जलवृष्टिके समान हैं, तथा मोक्षसुखरूप अमृतके तालाबके समान हैं; वे सम्यग्दर्शन आदि तीन रस भले प्रकार जयवन्त होते हैं ॥७८॥ सम्यग्दर्शन, सम्यज्ञान और सम्यक्चारित्र ये तीनों आत्माके निज स्वरूप हैं। इनमें जो भिन्नताकी बुद्धि होती है वह केवल शब्दजनित ही होती हैवास्तवमें वे तीनों अमिन ही हैं । आत्माका यह स्वरूप उपचारसे रहित अर्थात् परमार्थभूत और चेतना ही है एक स्वभाव जिसका ऐसा होता हुआ योगी जनोंकी योगरूप दृष्टिकी विषयताको प्राप्त होता है, अर्थात् १च प्रतिपाठोऽयम्ब क कुतात्मालरकृत, कुस्तामारूति । स स स्फोटने। एक पधन.५
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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