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________________ -67 : १-६७] १. धर्मोपदेशामृतम् 65 ) से छः पान्तु मुमुझसः कवरघरदैरविश्यामलो माक्षरितमझिनियासालाहोमादिय: काले मआदिले पतद्विरिकुले धाबडुनीसंकुले सम्झावातषिसंस्थुले तस्तले तिष्ठन्ति से साधवः ॥ १५॥ 66) म्लायस्कोकादे गलत्कपिमदे अश्यद्रुमौरच्छदे हर्षद्रोमदरिदके हिमऋतावस्यम्त दुःखदे।। ये तिष्ठन्ति चतुष्पये पृथुतपासौधस्थिताः साधवः ध्यानीमनहतोप्रशैल्यविधुरास्ते मे विषम्युः श्रियम् ॥ १६ ॥ 67 ) कालत्रये बहिरपस्थितिजातवर्षाशीतातपप्रमुखसंघटितोमरखे। आत्मप्रषोपविकले सकलो ऽपि कायक्लेशो वृथा वृतिरिवोतिशालिवने ॥ १७॥ पुमः सिक्षणे प्रीध्ये । प्रक्षीणनद्यम्भसि खोकनदीज। एवंभूते प्रीष्मे ये पर्वते विश्वन्ति ते मुनयः बदन्ति ॥ ६४ ते सातः । का युष्मान् । पान्तु रक्षन्तु । ये मुमुक्षवः मुनयः । वर्षाकाले तहतले तिष्ठन्ति । विलक्षणे वर्माया। सवैः मेवैः । मगरले मजन्ती इला भूमियत्र तस्मिन् मदिले । किंलक्षणैः मेधैः । स्तरवः शन्दयुकैः । पुनः मिलनः मन्दः । अनिश्शाम मेवैः । किं कुर्वद्विरित । अधिक्षारत्वदोषात्समुद्रसवन्धिक्षारसदोषात् । शवदारिमद्रिनि निरन्तरवतापनीले। पुनः मिलने वर्षाकाले । पतद्रिरिकुले पतन्ति गिरिकुलानि यत्र तस्मिन् पतद्रिरिकुले । पुनः किलक्ष पश्चि । धाकदुनीसको मुजनकीसंकले। पनाविलक्षणे वर्षाकाले । अमावातविसंस्एले भयानकवातयके। एविध वाले तमतले मनमः दिन्ति५. ते सापवः । मे मम । श्रियम् । विदयुः कुर्युः । ये साधवः । हिमऋतौ चतुष्पचे तिष्ठन्ति । विलक्षणे हिमसतौ। म्लाककोकमरे कमले। पुनः किंलक्षणे हिमऋतौ । गलकपिमदे विगलितवानरमदे । पुनः किलक्षणे हिमऋतौ । प्रश्यामौषमकने पतिसमूहपत्रे । पुनः किलक्षणे हिमती । हर्षदोमदरिद्रके कम्पितरोमदायके । पुनः किलको हिमऋतौ मसान्तसमये । एवंभूते हिमाती मुनयतुष्पथे तिष्ठन्ति । किंलक्षणा मुमयः । पृथुतपःसौधस्थिताः तपोमन्दिरे स्थिताः । पुनः बिलझमाः। थानोमप्रातोप्रशत्यधिधराः च्यानामिना प्रहतः स्फटितः उप्र शैत्यविधर-चीतको तेजवन्ति ॥१॥ आत्मप्रमोपविकले पसि पुरुषे । सकलोऽपि काययः । वृषा निष्फलम् । किलक्षणे। बात्मप्रभोधनिकले। कानयाये श्रीतोसम्वनिळे । गहिरनस्थितिबासवर्षाशीताताप्रमुखसंघटितोमःख कालत्रये' वमतिधनेन (३) जातः उपचः वर्शभीतापपरीपहश्युबेन संघटितम् पावं पत्र निवास करते हैं वे मुनिजन हमारे कल्याणके लिये होवें ॥६४|| बिस वर्षा कालमें गर्जना करनेवाले, अतिशय काले, तथा समुद्रविषयक क्षारत्व (खारापन) के दोषसे ही मानो निख ही पानीको उगलनेवाले (गिरानेवाले) ऐसे मेघोंके द्वारा पृथिवी जलमें डूबने लगती है। जिसमें पानीके प्रबल प्रवाहसे पर्वतोंका समूह गिरने लगता है, जो वेगसे बहनेवाली नदियोंसे व्याप्त होता है, तथा जो शंशावातसे (जलमिश्रित तीक्ष्ण वायुसे) संयुक्त होता है, ऐसे उस वर्षा कालमें जो मुमुक्षु साधु वृक्षके नीचे स्थित रहते हैं वे आप लोगोंकी रक्षा करें ॥६५॥ जिस ऋतु, कमल मुरझाने लगते हैं, बन्दरोंका अभिमान नष्ट हो जाता है, वृक्षसमूहसे पत्ते नष्ट होने लगते हैं, तथा शीतसे दरिद्र जनके रोम कम्पायमान होते हैं; उस अत्यन्त दुखको देनेवाली हिम (शिशिर) ऋतुमें विशाल तपरूपी प्रासादमें स्थित तथा ध्यानरूपी उष्णतासे नष्ट किये गये तीक्ष्ण शैल्यसे रहित बो साधु चतुष्पथमें स्थित रहते हैं वे साधु मेरी लक्ष्मीको करें ॥६६|| साधु जिन तीन कालोंमें घर छोड़कर बाहिर रहनेसे उत्पन्न हुए वर्षा, शैत्य और धूप आदिके तीन दुखको सहता है वह यदि उन तीन कोंमें अध्यात्म ज्ञानसे रहित होता है तो उसका यह सब ही कायक्लेश इस प्रकार व्यर्थ होता है जिस प्रकार कि चवस वर्ष। २ क धाधुनीसंकुले पुनः। स एवंविषे काले। ससासमूहे। ५ लित। काकत्रया
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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