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________________ पचनदि-पविशतिः 5618458) मोक्षे ऽपि मोहादभिलाषदोयो विशेषतो मोक्षमिवेधकारी। यतस्ततोऽध्यात्मरतो मुमुक्षुर्भवेत् किमन्यत्र कृताभिलाषः॥ ५५ ॥ 56) परिग्रहवतां शिवं यदि तदानलः शीतलो यदीन्द्रियमुखं सुखं तदिह कालकुटा सुधा। स्थिरो यदि तनुस्तदा स्थिरतरं तविम्बर भवे ऽत्र रमणीयता यदि तदिन्द्रजाले ऽपि च ॥५६॥ 57 ) समरमपि हदि येषां ध्यानवनिमदीते सकलभुवनमलं दखमानं विलोक्य। कृतभिय इव नशस्ते कषाया न तस्मिन् पुनरपि हि समीयुः साधषस्ते जयन्ति ॥ ५७॥ 58) अनर्घ्यरजत्रयसंपदो ऽपि निर्घन्धतायाः पवमद्वितीयम् । अपि प्रशान्ताः स्मरवैरिवल्या वैधव्यदास्ते गुरखो नमस्याः ॥ ५८॥ प्रहवताम् । कदाचिन्न सिद्धिः परिग्रहपिशाचपीडिताना मुनीनां सिद्धिर्न ॥५४॥ यतः यस्मात्कारणात् । मोझेऽपि मोहात् भभिलाषदोषः विशेषतः मोक्षनिषेधकारी भवति। ततः कारणात् अध्यात्मरतः मुमुक्षुः मुनिः अन्यत्र वस्तुनि कूतामिलापः कि भवेत् । अपि तु अन्यत्र वस्तुनि कृताभिलाषः न भवेत् ॥ ५५ ॥ यदि चेत् परिप्रहवा जीवानां शिवं भवेत् तदानलः शीतलो भवति । यदि घेत् । इन्द्रियमुखं सुखं भवेत् तदा इह जगति विषये कालकूटः बिषः सुधा अमृतं भवेत् । यदि चेत् । इयं तनुः स्थिरा भवेत् तदा तडित् विद्युदयुक्तम् अम्बरे स्थिरतरं भवति । यदि अत्र भवे संसारे रमणीयता भवेत् तदा इन्द्रजालेऽपि रमणीयता भवति ।। ५६॥ हि यतः। ते साधको जयन्ति । येषां मुनीश्वराणाम् । ध्यानवहिनदी ध्यानवहिप्रचलिते छवि । समर कामम् । दामानम् । विलोक्य हा ते कषाया नटाः। कृतमियः इव कृता भी भयं यः वे कृतभियः । किंलक्षण कामम् । सकलभुवनमालम् । ते करायाः तथा नष्टाः यथा पुनरपि तस्मिन् मुनीन इति । न समीयुः न प्राप्ताः। ते साधनो जयन्ति ॥ ५५ ॥ ते गुरवः । नमस्याः नमरकरणीयाः। ये अनपरतत्रयसंपदोऽपि निर्मन्यतायाः अद्वितीय पद प्रामाः । प्रशान्ता भी सिद्धि प्राप्त नहीं होती ॥ ५४ ॥ जब अज्ञानतासे मोक्षके विषयमें भी की जानेवाली अभिलाषा दोषरूप होकर विशेष रूपसे मोक्षकी निषेधक होती है तब क्या अपनी शुद्ध आत्मामें लीन हुआ मोक्षका अमिलाषी साधु स्त्री-पुत्र-मित्रादिरूप अन्य बाल वस्तुओंकी अभिलाषा करेगा। अर्थात् कभी नहीं करेगा ॥ ५५ ॥ यदि परिग्रयुक्त जीवोंका कल्याण हो सकता है तो अग्नि भी शीतल हो सकती है, यदि इन्द्रियजन्य मुख वास्तविक सुख हो सकता है तो तीन विष मी अमृत बन सकता है, यदि शरीर स्थिर रह सकता है तो आकाशमें उदित होनेवाली बिजली उससे भी अधिक स्थिर हो सकती है, तथा इस संसारमें यदि रमणीयता हो सकती है तो वह इन्द्रजालमें भी हो सकती है। विशेषार्थ-इसका अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार अमिका शीतल होना असम्भव है उसी प्रकार परिग्रहसे कल्याण होना भी असम्भब ही है। इसी प्रकार जैसे विष कभी अमृत नहीं हो सकता, आकाशमें चंचल बिजली कभी स्थिर नहीं रह सकती, तथा इन्द्रजाल कभी रमणीय नहीं हो सकता है; उसी प्रकार क्रमशः इन्द्रियसुख कभी सुख नहीं हो सकता, शरीर कभी स्थिर नहीं रह सकता, तथा यह संसार कभी रमणीय नहीं हो सकता है ॥ ५६ ॥ जिन मुनियोंके ध्यानरूपी अमिसे प्रज्वलित हृदयमें त्रिलोकविजयी कामदेवको भी जलता हुआ देखकर मानो अतिशय भवभीत हुई कषायें इस प्रकारसे नष्ट हो गई कि उसमें वे फिरसे प्रविष्ट नहीं हो सकी, वे मुनि जयवन्त होते हैं ॥ ५५ ॥ जो गुरु अमूल्य रसत्रयस्वरूप सम्पत्तिसे सम्पन्न होकर भी निर्ग्रन्थताके अनुपम पदको प्राप्त हुए हैं, तथा जो अत्यन्त शान्त होकर भी कामदेवरूपाधुकी पनीको १ स्थिरो। २ क श तमिदम्बरम् ।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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