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________________ -901 : २३-७४ २३. परमार्थविंशतिः 898 ) केमाप्यस्ति म कार्यमाभितषता मित्रेण चाम्येन वा प्रेमाहे ऽपि न मे ऽस्मि संपति सुखी तिष्ठाम्यई वाला। संयोगेन यदा कष्टमभवत्संसारचके चिर निर्षिणः खलु तेन सेन नितरामेकाकिता रोचते ॥४॥ 899) यो जानाति स एव पश्यति सवा चिद्रूपतां म स्यजेत् सोऽहं नापरमस्ति किंचिदपि मे तवं सदेतस्परम् । यचान्यत्तवशेषमम्यमनित क्रोधादि कायादि' वा श्रुत्वा शाखशतानि संप्रति मनस्येततं वर्तते ॥ ५॥ 900) हीन संहनने परीषासह नाभदिई सांप्रत काले दुःख[]मसंशये ऽत्र यदपि प्रायो न ती सपः। कश्चिन्नातिशयस्तथापि यदसायाते हि दुष्कर्मणा मन्त शुद्धचिदारमगुप्तमनसः सर्वे पर तेन किम् ॥ ६॥ 901 ) सहग्योधमयं विहाय परमानन्दस्वरूपं पर ज्योति म्यदहं विचित्रविलसत्कर्मकतायामपि । मे मम । केनापि मिश्रेण सह । च पुनः। अन्येन वो। आश्रितवता सेवकादिना या1 किमपि कार्य न अस्ति। मैम भोऽपि प्रेम । मस्ति । संप्रति भह केवलः सुखी तिष्यामि । अत्र संसारबके संयोगेन यत्कष्टम् अभवत् । चिरं बहुकालम् । तेन कटेन । मनु इति सल्ले । अहम् । निर्विणः परामुखः । तेन कारणेन । नितराम् अतिशयेन । एकाकिता रोचते ॥ ४॥ या जानाति परमात स एव ज्ञानवान् सदा चिद्रूपता न यजेत् । सोऽहम् अपर किंचिदपि एतत् परं तस्वं न अस्ति । सद्विद्यमानमपि । च पुनः। यत् अन्यत् तन् अशेषम । अन्य अनिले कोषादिकर्मकार्यादि क्रियाकारणम अन्यजनितं कर्मबनितम् अस्ति। शाखाणि अत्या संप्रति एतत् श्रुतं मनसि वर्तते । पूर्वोक ज्ञानरहस्यं इदि वर्तते ॥५॥ अत्र दुःस्वमसंज्ञके काले । यत् यस्मात्कारणात् । संहनन हीनम् । इदं शरीरे सांप्रत परीवहसई नाभूत् । मन परमकाले तीन सपः अपि न वर्तते । प्रायः भतिशयेन । तपः नास्ति । यत् यस्मात्कारणात् । असौ कश्चित् अतिशयः न । तथापि दुष्कर्मण आर्तम् अन्तःशुद्धचिदात्मगुप्तमनसः मुनेः सर्वम् । पर भिन्नम् । तेन कालेन भातेन । किं प्रयोजनम् ॥ ६॥ परज्योतिः सम्बोधमयं परमानन्दस्वरूपम् । बिहाय स्यक्ता । मन्मत सम्पन्न उस आनन्दकी कला को उत्पन्न करेगी ।। ३ || मुझे आश्रयमें प्राप्त हुए किसी भी मित्र अथवा अघुसे प्रयोजन नहीं है, मुझे इस शरीरमें भी प्रेम नहीं रहा है, इस समय मैं अकेला ही सुखी हूं। यहां संसारपरिभ्रमणमें चिर कालसे जो मुझे संयोगके निमित्तसे कष्ट हुआ है उससे मैं विरक्त हुआ हूं, इसीलिये अब मुझे एकाकीपन ( अद्वैत) अत्यन्त रुचता है ॥ ४ ॥ जो जानता है वही देखता है और वह निरन्तर चैतन्यस्वरूपको नहीं छोड़ता है । यही मैं हूं, इससे भिन्न और मेरा कोई स्वरूप नहीं है । यह समीचीन उत्कृष्ट तत्व है। चैतन्य स्वरूपसे भिन्न जो क्रोत्र आदि विभायभाव अथवा शरीर आदि हैं वे सत्र अन्य अर्थात् कर्मसे उत्पन्न हुए हैं । सैकडों शास्त्रोंको सुन करके इस समय मेरे मनमें यही एक शास्त्र ( अद्वैततत्व) वर्तमान है ॥ ५ ।। यद्यपि इस समय यह संहनन ( हड्डियोंका बन्धन) परीषहों (क्षुधा-तृषा आदि) को नहीं सह सकता है और इस दुःषमा नामक पंचम कालमें तीन तप भी सम्भव नहीं है, तो भी यह कोई खेदकी बात नहीं है, क्योंकि, यह अशुभ कर्मोंकी पीड़ा है । भीतर शुद्ध चैतन्यस्वरूार आत्मामें मनको सुरक्षित करनेवाले मुझे उस कर्मकृत पीड़ासे क्या प्रयोजन है ! अर्थात् कुछ भी नहीं है ॥ ६ ॥ अनेक प्रकारके विलासवाले काँक साथ मेरी एकताके होनेपर भी जो उत्कृष्ट ज्योति सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान एवं उत्कृष्ट आनन्दस्वरूप है वही मैं हूं, उसको छोड़कर मैं अन्य नहीं हूं। ठीक भी है- स्फटिक मणिमें काले पदार्थके सम्बन्धसे १च प्रविपाठोऽयम् । म क स कार्यादि । २ क 'वा' नास्ति। ३ का 'मम अङ्गेऽपि प्रेम न भस्ति' इत्येतावान् पाठो नास्ति।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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