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________________ [878; २१-१२ २४८ पचनन्दि-पञ्चविंशतिः तमा बजतु प्रभो जिनपते स्वस्थादपचस्मृते. रेषा मोक्षफलावा किस कथं नामिन् समर्था भवेत् ॥ १२ ॥ 878) पाणी प्रमाणमिह सर्वमिवत्रिलोकी साम्यली प्रपरदीपशिखासमाना । स्थाहावकासिकलिता नसुराद्विषन्या कालत्रये प्रकटिताखिलवस्तुतवा ॥ १३॥ 879) क्षमस मम वाणि तजिनपसिधुतादिस्तुती पवूनमभवामनोवचनकायकल्पतः। अनेकमवसंभवैडिमकारणः कर्ममिा कुतो किल मारशे जमानि तारशे पाटषम् ॥ १४ ॥ गिरः । सन्मार्गगाथा पापयरमे प्रवर्तनक्षीकामाः 1 किलक्षणात्कायात् । संवृतिवर्जितात् संवररहितात् । त्वत्पादपद्मस्थित्वेः मम ।। सस्कमै नाक्ष प्रजतु । एषा तव पावपस्थितिः । किल इति सत्ये । मोक्षफलप्रदा । अस्मिन् कर्मणि समों कथं न भवेत् । भपि देत १२॥ इहलोके । वाणी । सर्ववियः सर्वशस्य । प्रमायाम । अमौ वाणी । त्रिलोकीसवनि प्रवरदीपशिखासमाना। पुनः स्वादादकान्तिकलिता । पुनः किंलक्षणा वाणी । -मा-अहिबन्या । पुनः कालत्रये । प्रकटितम् अखिलं वस्तुतस्वं या सा प्रकटिताखिलवस्तुतरवा ॥१३॥ भो बाणि । जिनपतिश्रुतादिस्तुती स्तुतिविषये 1 मनोवचन कायवैकल्यतः। यत् अक्षरमात्रादिकम् अनम् अभवत् तत् मम क्षमस्व । भो जननि । किल इति सत्ये। भाजगति संसारे। मारने जने । कर्मभिः पीडिते। तारी पाय कृतः भवेन । लक्षणैः कर्मभिः । भनेकभवसंभवैः । जरिम कारणः मूर्खत्वकारणैः ॥ १४ ॥ अमं परयः जीयात् । वह तुम्हारे चरण-कमलके मरणसे नाशको प्राप्त होवे । ठीक भी है-- जो तुम्हारे चरण-कमलकी स्मृति मोक्षरूप फलको देनेवाली है वह इस (यापविनाश) कार्यमें कैसे समर्थ नहीं होगी ? अवश्य होगी ।। १२ ।। जो सर्वज्ञकी वाणी (जिनवाणी) तीन लोकरूप धरमें उत्तम दीपककी शिखाके समान होकर स्याद्वादरूप प्रमासे सहित है; मनुष्य, देव एवं नागकुमारोंसे धन्दनीय है; तथा तीनों कालविषयक वस्तुओंके स्वरूपको प्रगट करनेवाली है; वह यहां प्रमाण (सत्य) है | विशेषार्थ- यहां जिनवाणीको दीपशिखाके समान बतलाकर उससे भी उसमें कुछ विशेषता प्रगट की गई है। यथा-दीपशिखा जहाँ घरके भीतरकी ही वस्तुओंको प्रकाशित करती है वहां जिनवाणी तीनों लोकोंके मीतरकी समस्त ही वस्तुओंको प्रकाशित करती है, दीपक यदि प्रभासे सहित होता है तो वह वाणी भी अनेकान्तरूप प्रभासे सहित है, दीपशिखाकी यदि कुछ मनुष्य ही वन्दना करते हैं तो जिनवाणीकी वन्दना मनुष्य, देव एवं असुर भी करते हैं; तथा दीपशिखा यदि वर्तमान कुछ ही वस्तुओंको प्रगट करती है तो वह जिनवाणी तीनों ही कालोंकी समस्त वस्तुओंको प्रगट करती है। इस प्रकार दीपशिखाके समान होकर भी उस जिनवाणीका स्वरूप अपूर्व ही है ।। १३ ॥ हे वाणी ! जिनेन्द्र और सरस्वती आदिकी स्तुति के विषयमें मन, वचन एवं शरीरकी विकलताके कारण जो कुछ कमी हुई है उसे हे माता! तू क्षमा कर । कारण यह कि अनेक भवोंमें उपार्जित एवं अज्ञानताको उत्पन्न करनेवाले कोका उदय रहनेसे मुझ जैसे मनुष्यमें वैसी निपुणता कहांसे हो सकती है ! अर्थात् नहीं हो सकती है ॥ १४ ॥ समस्त भव्य जीवों के लिये अभीष्ट फलको देनेवाला यह क्रियाकाण्डरूप कल्पवृक्षकी १-प्रतिपाठोऽयम् का अस्थित् ।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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