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________________ -855 : १९-८] १९. श्रीजिनपूजाष्टकम् २४१ 852 ) देवो ऽयमिन्द्रियवलप्रलयं करोति नैवेद्यमिन्द्रियबलमदखाद्यमेतत् । चित्र तथापि पुरतः स्थितमहतो ऽस्य शोभा बिमति जगतो नयनोत्सवाय ॥ ५ ॥ 853) आरार्तिकं तरलपतिशिखं विभाति स्वच्छ जिनस्य वपुषि प्रतिविम्बितं सत् । ध्यानानलो मृगयमाण दवावशिष्टं दग्धं परिभ्रमति कर्मवयं प्रचण्डः ॥६॥ 854) कस्तूरिकारसमयीरिष पत्रपल्ली: कुपेन् मुखेषु चलनैरिह दिग्वधूनाम् । हर्षादिय प्रभुजिनाश्रयणेम पातशयपुर्नटति पश्यत धूपधूमः ॥ ७॥ 855) उम्फलाय परमामृतसंशकाय नानाफलैर्जिनपतिं परिपूजयामि । सतिर सफलानि फलानि भोक्षमा ससदपि याचत एव लोकः ।। ८॥ यहम्यं वस्तु यत्र न विद्यते तद्वस्तु तत्र 'योजितम् अधिको लक्ष्मी क्षोभा कुरुते ॥ ४ ॥ पुष्पम् । श्रयं देवः सर्वशः । इन्द्रियपले. प्रलयं करोति । एतत् नैवेद्य इन्द्रियबलपदस्वायम् इन्दियालपोषकम् । चित्रम् आश्चर्यम् । तभापि अस्य अर्हतः सर्वशस्य । पुरतः अग्रतः स्थितं शोभा विभर्सि । कस्म । जगतः नयनोत्सवाय आनन्दाय ॥५॥ नैवेद्यम् । आततिक दीवापः ] जिनस्य वपुषि शरीरे स्वच्छ प्रतिबिम्बित सत् विद्यमानं विभाति 1 किलक्षण ऐपम् [भारार्तिकम् तरला चमला वलि शिखा यत्र तत् तरलवाडे शिखम् । उत्प्रेक्षते। ध्यान-अनल: अमिः परिभ्रमति इव । किं कतम् इत्र । अवशिटम् उपद्वरितम् । कर्मचयं कर्मसमूहम् । दग्धुम् । मृगयमाणः अवलोक्यमान इव । किंलक्षणः ध्यानानलः । प्रायः ॥॥ दीपम् । भो भब्याः। यूयं पश्यत । कम् । धूपधूमम्। जिनाश्रयणेन हर्षात् नटति मृत्यति इव । किलक्षणं धूपम] बातेन प्रेसवपुः कम्पमानशरीरम् । इह समये। दिग्वधूनो दिशास्त्रीणाम् । मुखेषु । चलनैः परिभ्रमणः पत्रवली कुर्वन् इत्र । किंलक्षणाः पत्रवाणीः 1 कस्तूरिकारसमयीः ।। . ॥ धूपम् । अहं श्रारक जिनपति नानाफलः परिपूजयामि । कस्मै । उपः फलमय परम-अमृतसंज्ञकाय मोक्षाय । तद्भक्तिः तस्म जिनस्य भफिः पुष्पशरों (पुष्पमालाओंसे) से पूजा करता हूं । अन्य हरि, हर और ब्रह्मा आदि चूंकि पुष्पशरसे सहित हैं; अत एव उनकी पुष्पशरोंसे पूजा करनेमें कुछ भी शोभा नहीं है । इसी बातको पुष्ट करनेके लिये यह भी कह दिया है कि जहांपर जो वस्तु नहीं है वहींपर उस वस्तुके रखनेमें शोभा होती है, न कि जहांपर वह वस्तु विद्यमान है । तात्पर्य यह है कि जिनेन्द्र भगवान् ही जगद्विजयी कामदेवसे रहित होनेके कारण पुप्पोद्वारा पूजनेके योग्य हैं, न कि उक्त कामसे पीड़ित हरि-हर आदि । कारण यह कि पूजक जिस प्रकार कामसे रहित जिनेन्द्रकी पूजासे स्वयं भी कामरहित हो जाता है उस प्रकार कामसे पीड़ित अन्यकी पूजा करनेसे वह कभी भी उससे रहित नहीं हो सकता है ।। ४ ॥ यह भगवान् इन्द्रियबलको नष्ट करता है और यह नैवेद्य इन्द्रियबलको देनेवाला खाद्य (भक्ष्य) है। फिर भी आश्चर्य है कि इस अरहंत भगवान्के आगे स्थित वह नैवेद्य जगतके प्राणियोंके नेत्रोंको आनन्ददायक शोभाको धारण करता है |॥ ५ ॥ चंचल अमिशिखासे संयुक्त आरतीका दीपक जिन भगवान्के स्वच्छ शरीरमें प्रतिविम्बित होकर पेसे शोभायमान होता है जैसे मानो वह अवशेष (अघाति) कर्मसमूहको जलानेके लिये खोजती हुई तीन ध्यानरूप अनि ही घूम रही हो ॥ ६ ॥ देखो वायुसे कम्पमान शरीरवाला धूपका धुआँ अपने कम्पन (चंचलता ) से मानों यहां दिशाओंरूप स्त्रियों के मुखोंमें कस्तूरीके रससे निर्मित पत्रबल्ली (कपोलोपर की जानेवाली रचना ) को करता हुआ जिन भगवान्के आश्रयसे प्राप्त हुए हर्षसे नाच ही रहा है।॥ ७ ॥ मैं उत्कृष्ट अमृत नामक उन्नत फल (मोक्ष) को प्राप्त करनेके लिये अनेक फलोंसे जिनेन्द्र देवकी पूजा करता हूं । यद्यपि जिनेन्द्रकी भक्ति ही समस्त फलोंको देती है, तो भी मनुष्य अज्ञानतासे फलकी याचना शबलं। २ च-प्रतिपासोऽयम् । भकश धूमम् । ३श यद् अम्ब। ४मजोषित, शोषितं । ५० उद्धरितं । पान."
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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