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________________ [१९. श्रीजिनपूजाष्टकम् ] 848) जातियमरणमित्यनकायस्य जीवामितस्य तापकतो यथावत् । विण्यापनाय जिनपावयुगाप्रभूमी भारात्रय प्रबरवारिकतं क्षिपामि १॥ 849) पदाची बिनपदभवतापहा नाद सुशोतलमपोह भयामि तद्वत् ।। कर्पूरसम्बन मितीष मयार्पितं सत् स्वरपादपङ्कजसमाश्रयणं करोति ॥२॥ 850) राजपसौ शुचितराक्षतपुजयजिवचाधिकस्य जिनमक्षतममधूतः । वीरस्य मेतरजनस्य तु पीरपटो पदः शिरस्यासित भियमातनोति ॥३॥ 851) साक्षायपुष्पशर एवं जिमस्तवेनं संपूजयामि शुचिपुष्पशरैमनोह।। नाम्यं तदाश्रयतया किल पन यत्र सचम भ्यमधिकां कुयते च लक्ष्मीम् ॥ ४॥ जिनपावयुगामभूमौ । प्रवरसारितं मलकत भारावयं क्षिपामि । अहम् इति भष्याहारः । प्राविः जन्म जरा मरणम् इति अनरूत्रयस्य । स्थावत् विधिपूर्वकम् । विष्यापनार शान्तये । किलक्षणस्य अनलत्रयस्य । जीवेषु माश्रितस्य । पुनः बहुतापाहता भातापचारकस्य जलधारी रचन्दनं स्वत्पादपहजसमाश्रयणं करोति। भो देव । पूरबम्वनं तव वरण-भाश्रय मोति। भया पूजकेन । मर्पित इतम् । सत् समीचीनम् । इतीव । इसीति किम् । इह लोके। यह मुशीतलमपि तद्वत् शीत म भवामि यत् बिगपतेः परः । भवतापहार संसारतापहरणक्षीयम् । कर्पूर चन्दनम् इति इसोः सर्वज्ञस्य चरणकमलम् बाधयति ॥१॥ पसभामा असो चितराशतपचरावि।। राजति शोभते । लक्षणा भखतपराजिः। घिनम मधिसत्यता जिनम् । ममतः इन्द्रियभूतः कृत्वा । नक्षतं न पीचितम् । पझे इन्त्रिकम्पटम पातितम् । महावीरस्य । शिरसि मस्तके पट्टः । मतितराम् अतिशयेन । भिवं श्चोभाम् । आतनोति विस्तारयति । तु पुनः। इतरस्म जमस्म कुवैवस्म का कातरजमस्य। पहः बयान मते ॥ ३ ॥ अक्षतम् । एष बिना साक्षात् । अपुष्पशरः कन्दर्परहितः । तत्तस्मात् । एनं श्रीसर्वशम् । मनोह-शनिपुश्मशः कसुम्याममिः । गई पूजकः संपूजयामि । अन्य न पूजयामि । कया। तदाश्रयतया । कामालमत्केन मन्य न वर्षयामि। __ जन्म, जरा और मरण ये जीवके आश्रयसे रहनेवाली तीन अग्नियां बहुत सन्तापको करनेवाली हैं। मैं उनको शान्त करने के लिये बिन भगवान्के चरणयुगलके आगे विधिपूर्वक उत्तम जलसे निर्मित तीन धाराओंका क्षेषण करता हूँ॥१॥ जिस प्रकार जिन भगवान्की वाणी संसारके सन्तापको दूर करनेवाली है उस प्रकार शीतल हो करके भी मैं उस सन्तापको दूर नहीं कर सकता हूं, इस प्रकारके विचारसे ही मानों मेरे द्वारा भेंट किया गया अमूरमिश्रित वह चन्दन हे भगवन् ! आपके चरणकमलोंका आश्रय करता है ॥ २॥ इन्द्रियरूप घूतोंक द्वारा बाधाको नहीं प्राप्त हुए ऐसे जिन भगवान्के आश्मसे दी गई वह अतिशय पवित्र अक्षतोंके पुंजोंकी पंक्ति सुशोभित होती है। ठीक है- पराक्रमी पुरुषके विरपर बांधा गया वीरपट्ट जैसे अत्यन्त शोमाको विस्तृत करता है वैसे कायर पुरुषके शिरपर बांधा गया यह उस शोभाको विस्तृत नहीं करता ॥ ३ ॥ यह जिनेन्द्र प्रत्यक्षमें अपुष्पशर अर्थात् पुष्पशर (काम) से रहित है, इसलिये मैं इसकी मनोहर पवित्र पुष्पशरों (पुष्पहारों ) से पूजा करता हूं। अन्य (ब्रह्मा आदि) किसीकी मी मैं उनसे पूजा नहीं करता हूं, क्योंकि, वह पुष्पशर अर्थात् कामके अधीन है। ठीक है--जो रमणीय वस्तु जहां नहीं होती है वह वहां अधिक लक्ष्मीको करती है। विशेषार्थ- पुष्पशर शनके दो अर्थ होते हैं, पुष्परूप भोंका धारक कामदेव तथा पुष्पमाला । यहाँ श्लेषकी प्रधानतासे उक्त दोनों अर्थोकी विवक्षा करके यह बतलाया गया है जिन भगवानके पास पुष्पशर (कामवासना) नहीं है, इसलिये मैं उसकी समाधारा चन्दनं मयतएलादिशब्दार टीकायाः प्रारम्भे लिखिताः सन्ति । २ श कपूरचन्वन नास्ति। समतल न भवामि यत् स्वेतावान् पाठो नास्ति।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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