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________________ २०८ [713:18. पचनन्दि-पञ्चविंशतिः 718) पोय पिव तुहावरण संलीणा फुरामहोकयजाडोह। हेलाए बिय जीवा तरंति भवसायरमण ॥ ३२॥ 714) तुपयणं चिय साहा गणमणेतबादषियडबई । तह हिययाइअर सव्वत्तणमप्पणो णाह । ३३ । 715) विपडिवजह जो तुह गिराप महसुइबलेण केवलिणो। परदिटिविट्ठणहर्जतपक्खिगणणे वि सो अंधो ॥ ३४ ॥ 716) भिण्याज परणयाणे एकेकमसंगया गया तुज्य । पार्वति जयम्मि जयं मजमिम रिऊण किं चित्तं ॥ ३५ ॥ 717) अण्णस्स जप जीहा कस्स सयाणस्स बणेणे तुम। - जरथ जिण ते वि जाया सुरगुरुपमुहा कई कुंठा ॥ ३६॥ अहो इत्याचयें । मो पूज्य । स्फुटं व्यक्तम् । जीवाः हेलया भनन्तभवसागरं तरन्ति । किंलक्षणा भव्याः । सब प्राये सलमाः । यया नराः पोतं प्रत्रहणम् आश्रित्य अलीपं समुद्र तरन्ति ॥ ३२ ॥ भो माय। भो अर्घ्य । तम वरन न निखितम् अनेकान्तवादविकटपर्य साधयति । तथा आत्मज्ञानिना सर्वेषां हृदयप्रदीपकर तब वचनम् ॥१५॥ भोख । यः मू: सब केवलिनः बायो इतिश्रुतिषलेन गिनियारो संशयं रोले। आर मासिएन भवाम्ननिगणने संख्य करोति ॥ ३ ॥ भो देव । तवं नयाः भिषान परभयानां रिपूणां मध्ये जगाये जयं पावंति प्रामुवन्ति । ताकि चित्रम् । किलक्षणाद्धब नयाः। एकम् एकम् असंगताः अमिलिताः ॥ ३५ ॥ मो जिन । जगति संसारे। तव वर्णने अन्यस सझानस प्रवीणस्य कस्य जिला वर्तते । अपि तु न कस्यापि । यत्र तव वर्णने सुरगुरुप्रमुखाः कवयः देवाः कुण्ठा मूळः जाताः । मन्स अवश्य ही उससे अनुपम फल ( मोक्षसुख ) प्राप्त होता है ॥ ३१ ।। जिस प्रकार जडौष ( जलौष ) अर्थात् बलकी राशिको अधःकृत (नीचे करनेवाली) नायका आश्रय लेकर प्राणी अनायास ही अपार समक्के पार हो जाते हैं, उसी प्रकार जडौत्र अर्थात् अज्ञानसमूहको अधःकृत (तिरस्कृत ) करनेवाली आपकी वाणीरूप नाकका आश्रय लेकर भन्य जीव भी अनायास ही अनन्त संसाररूप समुद्रके पार हो जाते हैं, यह स्पष्ट है ॥ ३२ ॥ हे नाथ ! हृदयमें प्रतीतिको उत्पन्न करनेवाली आपकी वाणी ही निश्चयसे अनेकान्तवादरूप कठिन मार्गको तथा अपने सर्वज्ञत्वको भी सिद्ध करती है ॥ ३३ ॥ हे भगवन् ! जो मनुष्य अपने मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके बलपर आप जैसे केवलीकी वाणीके विषयमें- उसके द्वारा निरूपित तत्त्वस्वरूपमैविवाद (सन्देहादि) को प्राप्त होता है, उसका यह आचरण उस अन्धे मनुष्यके समान है जो किसी निर्मल नेत्रोंवाले अन्य मनुष्यके द्वारा देखे गये ऐसे आकाशमें संचार करते हुए पक्षियोंकी गणना ( संख्या में विवाद करता है ॥ ३४ ॥ हे भगवन् ! जगत्में आपके पृथक् पृथक् एक एक नय शत्रुभूत भिन्न मिन परमतंकि मध्यमें यदि जयको प्राप्त करते हैं तो इसमें आश्चर्य क्या है ? कुछ भी नहीं ॥ ३५॥ हे जिन। जगत्में जिस तुम्हारे वर्णनमें बृहस्पति आदि कवि भी कुण्ठित ( असमर्थ ) हो चुके हैं उसमें भला अन्य किस बुद्धिमान्की जिह्वा समर्थ हो सकती है। अर्थात् आपके गुणोंका कीर्तन जब वृहस्पति आदि भी नहीं कर सके हैं तब फिर अन्य कौन-सा ऐसा कवि है जो आपके उन गुणोंका पूर्णतया कीर्तन कर सके !॥ ३६॥ कस्साइसमान १सस्विपि प्रतिषु 'पबयणमि पाठः। २च-प्रतिपाठोऽयम् । मकश पईयअरे 1 ३श पक्व । म वणगे, करसायसयाण वगणे ।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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