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________________ AVAN -644:११-४७ १२ पाया 640 ) हेयोपादेयधिभागभाषनाकथ्यमानमपि तस्वम् । हेयोपदिय विभागभावनावर्जितं विद्धि ॥ ४॥ 641) प्रतिपचमानमपि च भूताद्विशुद्ध परात्मनस्तस्वम् । उररीकरोतु चेतस्तदपि न तोतसो गम्यम् ॥ ७ ॥ 642 ) अइमेकाफ्यात द्वैतमहं कर्मकलित इति युद्ध। आयमनपायि मुकेरितरविकल्प भवस्य परम ॥४५॥ 643 ) बद्धो मुक्तोऽहमथ बैते सति जायते ननु छैतम् । मोक्षायेत्युभयममोषिकल्परहितो भवति मुक्तः ॥ ४ ॥ 644) गतमाविभवद्भावाभावप्रतिभावभावितं घिसम् । अभ्यासाश्चिवूपं परमानन्दान्वितं कुरुते ॥ ४७n सबै विद्धः भारमा सहजैकबोधरूपे विष्ठति ॥ ४२ ॥ हेयं याज्यम् उपादेयं प्रहणीमै तयोः वयोः हेयोपादेययोः वय विभागभावनया भेदभावनया कृत्वा कध्यमानम् अपि । तत्वं हेयोपादेयमेदभावनया वर्जितम् । तत्त्वं विसि ॥३॥ र पुनः । परात्मनः विशुद्ध सस्थम् । श्रुतात् शास्त्रात् । प्रतिपद्यमानमपि फरमानमपि । चेतः उरीकरोतु अङ्गीकरो। सदपि तत्वम् । खेतसः गम्यं गोचर म ॥४॥ अहम् एकाकी इदि मुझेः सकाशात् बद्वैतम् । बह ककलितः इति दे तम। आर्थ मरः अनपाय विवरहितम । इतरत तं पर भवस्य संसारस कारणं विकल्पम् ॥ १५॥ मईपक्ष भय महे मुचः ते सति मनु दैत जायते । इति हेतोः। मोक्षाय उभयमनोविकल्परहितः मुजः भवति ॥४६गतमानिमरदानाः तेषाम् मभावः षवीतभविष्यर्तमामाः भाषाः तेषाम् अभावः तस्य प्रतिभावः संभावन तेन भावित जि मेदहोता हुआ एक अपने स्वाभाविक ज्ञानस्वरूपमें स्थित हो जाता है ॥ ४२ ॥ हेय और उपादेयके विभागकी भावनासे कहा जानेवाला भी तत्त्व उस हेय-उपादेयविभागकी भावनासे रहित है, ऐसा जानना चाहिये । विशेषार्थ-पर पदार्थ हेय हैं और चैतन्यमय आत्माका स्वरूप उपादेय है, इस प्रकार व्यवहारनयकी अपेक्षा हेय-उपादेयविभागकी भावनासे ही यद्यपि आत्मतत्तका वर्णन किया जाता है। फिर भी निधयनयकी अपेक्षा वह समत विकल्पोंसे रहित होनेके कारण उक्त हेय-उपादेयविभागकी भावनासे भी रहित है।॥ १३॥ यद्यपि मन आगमकी सहायतासे विशुद्ध परमात्माके स्वरूपको जानकर ही उसे स्वीकार करता है, फिर भी बह आत्मतत्त्व वास्तवमें उस मनका विषय नहीं है ॥ विशेषार्थ- अभिप्राय यह है कि आत्मतत्वका परिज्ञान आगमके द्वारा होता है और उस आगमके विचारमें मन कारण है, क्योंकि, मनके बिना किसी प्रकारका भी विचार सम्भव नहीं है। इस प्रकार उस आत्मतत्वके स्वीकार करनेमें यद्यपि मन कारण होता है, फिर भी निश्चयनयकी अपेक्षा यह आत्मतत्त्व केवल खानुभवके द्वारा ही गम्य है, न कि अन्य मन आदिके द्वारा ॥ १४ ॥ मैं अकेला हूं' इस प्रकारकी बुद्धिसे अद्वैत तथा मैं कर्मसे संयुक्त ई' इस प्रकारकी बुद्धिसे द्वैत होता है । इन दोनोंमेंसे प्रथम विकल्प (अद्वैत) अविनश्वर मुक्तिका कारण और द्वितीय (द्वैत) विकल्प केवल संसारका कारण है ॥ १५ ॥ मैं बद्ध हूं अथवा मुक्त हूं, इस प्रकार द्वित्वबुद्धिके होनेपर निश्चयसे द्वैत होता है । इसलिये जो योगी मोमके निमित इन दोनों विकल्पोंसे रहित हो गया है वह मुक्त हो जाता है ।। ४६ ॥ भूत, भविष्यत् एवं वर्तमान पदार्थोके अभावकी भावनासे परिपूर्ण चिप अभ्यासकें बलसे चैतन्य स्वरूपको उत्कृष्ट आनन्दसे युक्त कर देता है ॥ विशेषार्थ-निश्चयसे मैं शुद्ध मुसरविणापपर सचेतरविकल्प। ५क बड़ीकरोद्ध भारित। इतः। स कारणविकल्प। रविवात्रि। .
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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