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________________ १७१ -559 : १०१२] १०. सदोषचन्द्रोषयः 555) नूनमत्र परमात्मनि स्थित स्वान्तमम्तमुपयाति तबहिः। तं विहाय सततं भ्रमस्यदः को विमेति मरणाच भूतले ॥८॥ 556 ) तस्वमात्मगतमेव मिखितं यो ऽस्पदेचा निहित समीयते। वस्तु मुष्टिविधृत प्रयशतः कानने सगयते स मूटपी॥९॥ 557) तत्परः परमयोगसंपदा पात्रमत्र म पुनर्वहिर्गतम्। नापरेण चलि[लतो यथेप्सितः स्थानझामविमषो निमाम्यते ॥१॥ 558) साधुलक्ष्यमनवाप्य निम्मये यत्र सुख गहने तपसिनः। अप्रतीतिभुषमाश्रिता जडा मान्ति माव्यगतपारसंमिमा॥१९॥ 559) भूरिधर्मयुतमप्यदुखिमानन्मतिविधिनागपुण्य पत्। भ्राम्यति प्रचुरणामसंकरे पातु पस्तदतिशापि चिन्महः ॥ २२ ॥ पाइनीजम् । यतः सकाशात् । स्वानुभूतिविषयः गोचरः । ततः कारयात् । पुष्पवत् नाति इति व ॥ ॥ न लिखितम् । खान्त मनः भर परमात्मनि । स्थितम्। अन्तं विनाशम् उपयादि। सत्तमाःकारणात् । परमात्मानम् विहाय खाया । मादः मनः। सतसं निरन्तरम् । बईः बाये। प्रमति। भूतले मरणात् कामाविमा यात्ममत सत्यम् अन्यसनिहित विलित समीक्षते। सः । मधीः मूर्खः । मुष्टिवित बस्तु बनने वने । प्रबलतः । मृगयते मालोस्पति पत्र परमात्मनि । तत्परः सावधानः भन्यः । परममोगसंपदा पात्रं भवेत् । पुनः रहिर्गतः न भरेत् । मास्मरहितः प्रात्मपत्र न मवेत् । अपरेन बबा - लि[M] तः सामान्यमार्गबलितः । ईप्सितः स्थानकाभविभवः । न विभाबते न प्राप्यते ॥१॥ यत्र चिन्मये । पसिनः मुनीधराः । साधु लक्ष्य समीचीलखभावम् । अनवाप्य अप्राप्य । अप्रतीविमुवम् माश्रिताः भुमीवरा डा मूर्जाः । मान्ति। के इन। नायपतपात्रवेनिभाः परशा सोमन्ते ॥ ११॥ सत् भिन्नरः । बुम्मान् । पातु रखतु । सिमक्ष महः । अतिशायि भतिशययुतम् । यत् वेतम्मतत्वम् । भरिधर्मपुतम् मपि। बबुद्धिमान मूर्यः । समहतिविधिना । मानानम् । वह सत् ही है, न कि असत् ॥ ७॥ पहा परमात्मामें लिखत दुभा मन निश्चयसे मरणको प्राप्त हो आग है। इसीलिये वह उसे (परमात्माको) छोड़कर निरन्तर बाब पदामि विचरता है। ठीक है इस पृथिवीतलपर मूत्युसे कौन नहीं जाता है। अर्थात् उससे सब ही उरते हैं।॥ ८ ॥ तन्य तस्व निम्नवसे मपने मापमें ही स्थित है, उस चैतन्यरूप तत्त्वको जो अन्य सानमें सित समझता है वह मूर्स मुहीमें रखी हुई बसको मानों प्रयमपूर्वक वनमें खोजता है ॥९॥ जो भव्य जीव इस परमात्मतत्त्वमें तल्लीन होता है यह समापिलप सम्पत्तियोंका पात्र होता है, किन्तु जो बाध पदार्थोंमें मुग्ध रहता है वह उनका पात्र नहीं होता है। बैंक हैजो दूसरे मार्गसे चल रहा है उसे इच्छानुसार खानकी प्रतिरूप सम्पत्ति नहीं प्राप्त हो सकती है॥१०॥ जो तपस्वी अतिशय गहन उस चैतन्यखरूप तत्व के विषयमें लक्ष्य (वेष्य) को न पाकर मतसमकाम (मिथ्यात्व ) रूप भूमिकाका आश्रय लेते हैं वे मृद्धि नाटकके पात्रोंक समान प्रतीत हैं। विशेषार्थजिस प्रकार नाटफके पात्र राजा, रैक एवं साघु आदिके भेषको ग्रहण करके और तदनुसार ही उनके चरित्रको दिखला करके दर्शक जनोंको यद्यपि मुग्ध कर लेते हैं, फिर भी थे यमार्ष राजा मादि नहीं होते । ठीक इसी प्रकारसे जो भाव तपश्चरणादि तो करते हैं, किन्तु सम्यग्दर्शनसे रहित होनेके कारण उस चैतन्य तत्त्वका अनुभव नहीं कर पाते हैं वे योगीका मेष ले करके भी वास्तविक योगी नहीं हो सकते ॥ ११ ॥ अज्ञानी प्राणी बहुत धोषाले जिस चेतन तत्त्वको अन्ध-हस्ती न्यायसे आन करके भनेक अन्म-मरणोंसे भयानक इस संसारमें परिश्रमण करता है वह अनुपम चेतन तत्त्वरूप सेज आप सबकी रक्षा १५श लिखित । २ वषपान नास्ति ।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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