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________________ -587 :९-२३] ९. मातोमना 535 ) आषिम्याधिजसमृतिप्रभृतयः संपनियनो वर्ग स्तद्रिनस्य ममात्मनो मगवतः कर्तुमीशा जा। नानाकारविकारकारिष इमे साझाममोमटले तिष्ठन्तोऽपि न कुर्वते जलमुचस्तत्र स्वरूपान्तरम् ॥ २१ ॥ 536) संसारातपदश्चमानवपुषा दुम्वं मया खीयते नित्य नाथ यथा स्पलस्थितिमता मत्स्येन ताम्बन्मनः। कारण्यामृतसंगशीतलतरे त्वत्पादप रहे यावद्देव समर्पयामि हृदयं तावत्परं सौववाद२२॥ 537) साक्षत्राममिदं मनो भवति यदायासंबन्धमा तत्कर्म प्रविकृम्भते पृथगई तस्मात्सदा सर्वो। चैतन्यासव तत्तति यदि या तत्रापि तत्कारणे शुद्धात्मन, मम निश्चयात्पुनरिह त्वय्येव देव खितिः॥ २३॥ सदक्षा इतरनिग्रहः दुष्टनिप्रहः ॥ २० ॥ आधिर्मानसी व्यथा । बाधिः भरोत्सारामृति मरमामृतमः । . रस्य संबन्धिनः सन्ति । इमे पोका रोमाः सः मम पास्मनःपाः समाः। नयिपियस मम । तद्विमस्य तेभ्यः रोगादिभ्यः मित्रस्य । पुनः मिलक्षणस । भपक्तः परमेघरस नानासारविपारमारिकार: मेषाः नभोमण्डले साक्षात् तिष्ठन्तोऽपि। तत्र पालाश्चमण्डले । खरूपान्तरं कसं न समाः सन्ति पासम्म बर्मन कुर्वते ॥ २१॥ हे नाप । मया । नित्य सदैव । कुन स्वीयते । चिकेन मना । संखरानपरसामानसमा शरीरेन । क्या स्थलस्थितिमता मत्स्येन ताम्यन्मनः यया भवति तथा दुःखं स्थापते। हे देवा पावलाम् । ससारमले न चरणम हृदयं समर्पयामि । तावत्कालं पर सौरस्यवान् । विलक्षणे तव चरणकमले। काम्यामूलवशीयन्तरे ॥२२॥क्षाको शुद्धात्मन् । इद मनः यद् बाह्यासंबन्धमा भवति। सिलवयं मनः। साक्षणामम् इनिरामेव पर्वमानम् । कर्म प्रतिकृम्भते प्रसरति 1 मई सदा सर्वद । तस्मात्कर्मणः पृथक पान वा तवा चैतन्वान त । यानि मावि । मम । रक्षा करना और दुष्टको दण्ड देना, यह न्यायप्रिय राजाका कर्तव्य होत है ॥२०॥ आषि (मानसिक कष्ट), न्याधि ( शारीरिक कष्ट), जरा और मृत्यु आदि शरीरसे सम्पम रखनेवाले हैं। में मगवान् बात्मा उस शरीरसे भिन्न हूं, अत एव उस शरीर सम्बन्धी वे बद गाषि-यापि यदि मेरा सा कर सकते हैं। अर्थात् ये आत्माका कुछ भी विगाड़ नहीं कर सकते। ठीक भी है--प्रत्ययामें अनेक आकारों और किया को करनेवाले ये बादल आकाशमण्डलमें रहकर भी आकाशके स्वरूप में कुछ भी बन्तर नहीं करते है ।। २१ ॥ जिस प्रकार जलके सूख जानेपर स्खलमें स्थित हुआ मत्स्स मनमें अतिशय कष्ट पात्व है उसी प्रकार संस्पररूप घामसे जलनेवाले शरीरको धारण करता हुआ यहां लित होकर मैं भी अतिशय कर पा रहा है। देव । जब तक मैं दयारूप अमृतके सम्बन्धसे अतिशय शीतलताको प्राप्त हुए तुम्हारे भरप-ममें बने हृदयको समर्पित करता हूं तब तक अतिशय सुखका अनुभव करता हूं॥ २२ ॥ हे शुद्ध अत्लन् । इन्द्रिक समूहके साथ यह मन चूंकि बाध पदार्थोंसे सम्बन्ध रखता है, अत एव असे कर्म बढ़ता है। मैं स से सदा और सब प्रकारसे भिन्न हूं अथवा तुम्हारे चैतन्यसे वह कर्म सर्वच मिल है। वहां भी बही पूर्वेत (चेतनाचेतनत्व) कारण है । हे देव ! मेरी खिति निश्चयसे यहां तुम्हारे विषयमें ही है ॥ २३ ॥ म प्रतिष्मते । २ क सर्वदा। नाना घरकार । ४का बासित। ५
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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