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________________ १६२ पचनन्दि पश्चविंशतिः एतसादापे दुष्करमधिना सिद्भिर्यसो पातालीतरलीकृत दलमिव भ्राम्यत्यदो मानसम् ॥ १३ ॥ 528) झपाः कुर्वदितस्ततः परिलसद्वाह्मार्थकामाइकनित्यं व्याकुलतां परों गतवतः कार्य विनाप्यात्मनः । प्रामं वासयदिन्द्रियं मवकृतो दूरं सुहृत् कर्मणाः क्षेमं तावदिहास्ति कुष यमिनो यावन्ममो जीवति ॥ १४ ॥ 529 ) नूनं मृत्युमुपैति यातममलं त्वां शुद्धबोधात्मकं त्यतस्तेन वहि श्रमत्यविरतं घेतो विकल्पाकुलम् । स्वामिन् किं क्रियते ऽत्र मोहवशतो मृत्योर्ते भी कस्य तत् सर्वानर्थपरंपरावहितो मोहः स मे धार्यताम् ॥ १५ ॥ (527:9-17 तपोवनम् इताः प्राप्ताः । तत्र तपोवने । संशयः उज्झितः यतः । एतस्मादपि दुष्करमतविषेः सकाशात् सिद्धिः अद्यापि न । यतः अदा मानसं भ्राम्यति । कमिव । दलमिव पत्रमिव । किंलक्षणं दलम् । बातालीतरलीकृतं वातानाम् आली पङ्क्तिः तथा चलीकृतम्॥१३॥ इह लोके । यमिनः सुनेः । यावन्मनः यावत्कालं मनः जीवति तावत्कालं क्षेमं कुत्र अस्ति । मनः किं कुर्वत् । इतस्ततः सम्पाः कुर्वत् । पुनः किं कुर्वत्। बाह्य-अर्थलाभात् परिलसत् । पुनः किं कुर्यत् । नित्यं परी व्याकुलतां ददत् । आत्मनः कार्यं विनापि । किंलक्षणस्य आत्मन: । गतवतः ज्ञानयुक्तस्य । पुनः इन्द्रियं प्राम वासमषकृतः कर्मणः । दूरम् अतिशयेन युहृत् मित्रम् । एवंभूतस्य मुनेः मनः यावत्कालं जीवति तावत्क्षेमं कुत्र । अपि तुम || १४ || ३ स्वामिन् । भो श्री अईन् । चेतः मनः । अमलं निर्मलम् । शुद्धबोधात्मकं त्वाम् । यातं प्राप्तम् । नूनं निधितम् । मृत्युम् उपैति गच्छति । किंलक्षणं मनः विकल्पेन आकुलम् । तेन कारणेन । अविरतं निरन्तरम् । त्वत्तः सर्वज्ञतः । लिये हम धन-सम्पति आदिको छोड़कर तपोवनको प्राप्त हुए हैं और उसके विषयमें हमने सब प्रकार के सन्देह को भी छोड़ दिया है । किन्तु इस कठिन व्रतविधान भी अभी तक सिद्धि प्राप्त नहीं हुई। इसका कारण यह है कि वायुसमूह के द्वारा चंचल किये गये पत्ते के समान यह मन श्रमको प्राप्त हो रहा है || १३ || ओ मन इधर उधर सपाटा लगाता है, बाझ पदार्थोके लाभसे हर्षित होता है, विना किसी प्रयोजनके ही निरन्तर ज्ञानमय आत्माको अतिशय व्याकुल करता है, इन्द्रियसमूहको वासित करता है, तथा संसारके कारणीभूत कर्मका परम मित्र है; ऐसा वह मन जब तक जीवित है तब तक यहां संयमीका कल्याण कहांसे हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता || विशेषार्थ - इसका अभिप्राय यह है कि जब तक मन शान्त नहीं होता तब तक संयमका परिपालन करनेपर भी कभी आत्मका कल्याण नहीं हो सकता है । कारण यह कि मनकी अस्थिरतासे बाद दृष्टानिष्ट पदार्थोंमें राग-द्वेषकी प्रवृत्ति बनी रहती है, और जब तक राग-द्वेषका परिणमन है तब तक कर्मका बन्ध भी अनिवार्य है। तथा जब तक नवीन नवीन कर्मका बन्ध होता रहेगा तब तक दुःखमय इस जन्म मरणरूप संसारकी परम्परा भी चालू ही रहेगी । इस अवस्था में आत्माको कभी शान्तिका लाभ नहीं हो सकता है । अत एव आत्मकल्याणकी इच्छा करनेवाले भव्य जीवको सर्वप्रथम अपने चंचल मनको वशमें करना चाहिये । मनके वशीभूत हो जानेपर उसके इशारेपर प्रवृत्त होनेवाली इन्द्रियां स्वयमेव बशंगत हो जाती हैं। तब ऐसी अवस्थामें बन्धका अभाव हो जानेसे मोक्ष भी कुछ दूर नहीं रहता ॥ १४ ॥ हे स्वामिन् | यह चित्त निर्मल एवं शुद्ध चैतन्यस्वरूप आपको प्राप्त होता हुआ निश्वयसे मृत्युको प्राप्त हो जाता है । इसीलिये वह विकल्पोंसे व्याकुल होता हुआ आपकी ओरसे हटकर निरन्तर बाह्य पदार्थों में ९ श मुनेः मनः यावत्कालं जीवति । २ का
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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