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________________ P - - -- --- -182: ७२४] ५.देशसोदयोलबम् 480) विवादलोजातियोषतिमेव मक्त्या के कारपति जिनसाजिनाकृति। पुणे नदीथति नागपि देश बना पाई पदानि कारपितुईपस्य ॥ १२ ॥ 481) पानामिः सपनर्मदोत्सवात पूामिलोकर मैलिमियम कलौस्तूविक गरे। घण्टाचामरवर्पणादिमिरपि प्रस्ताय शोमा परी भव्या पुण्यमुपार्जयन्ति सततं सत्या त्यावे ॥२३॥ 482) चाणवतेषारिणो ऽपि नियतं यान्स्येव देवास तिम्पेष महर्षिकामरपदं तदेव सान्या चिरम् । अचागल्य पुनः कुळे ऽतिमहति प्राप्य प्रकर शुमा म्मानुष्यं च विरागतां च सककल्यागं च मुकास्ततः ॥ २४ ॥ व पुनः चैत्यगृहं कारयते स ममयः। सतां पन्यः सस्सुकवाणा पन्धः ॥ २१॥ मम्माः । जिनसमा च पुनः । बिनाकति माया कारयन्ति निम्बादसोचति कन्वूही-मसम्मानम् । जिनसड्म । यथोचति पा-मविसमान । बिमातिम् । कारपन्ति । इह लोके । ती पुर्य सोतुम् । वापि सरसत्यपि । शका समर्या । मैन । परस्य यस्य कारवितुः बिमसब नाति बारमिदः । किमु का वासी ॥ २२ ॥ मात्र स्वाकये सति । भम्माः । सततं निरन्तरम् । पुम्पम् उपायन्ति। अमिः। मात्रामिः । पुनः कैः । मपनैः महोत्सवशतैः पूजामिः । उन्लेचकैः चन्द्रोपकैः । पुण्यम् सपार्षन्ति । पुनः नैवेद्यः । परिभिः यो । बजेः । फलशैः । तौर्यत्रिक गीततत्यमादित्रैः। जागरैः । पाटाचामरवर्पण-आवशतैः मपि। परी थोमा प्रस्ताव पुण्यम् उपार्जयन्ति भव्याः ॥ २३ ॥ ते भवतारिणः श्रावका मपि चेत्यालम मान्ति । तत्र देवनोके । महर्दिभमरपद चा। सिबहुसरं कालम् । तिष्ठन्ति । पुनः । अत्र मनुष्यलोके भागत्य अतिमहति के । शुभात् पुण्यात् । मानुष्यं प्राप्य । व पुनः । नहीं देखने में आता । फिर मी जो भव्य विधि पूर्वक उक्त जिनप्रतिमा और जिनगृहकर निर्माण कराता है वह सज्जन पुरुषोंके द्वारा वन्दनीय है।॥ २१ ॥ जो भव्य जीव भक्तिसे कुंदुरके फ्लेके बराबर मिनालय तथा जौके बराबर जिनप्रतिमाका निर्माण कराते हैं उनके पुण्यका वर्णन करने के लिये यहाँ बाणी (सरस्वती) मी समर्थ नहीं है । फिर जो भल्य जीव उन ( जिनालय एवं जिनप्रतिमा) दोनोंका ही निर्माण करता है उसके विषयमें क्या कहा जाय ! अर्थात् वह तो अतिशय पुण्यशाली है ही ॥ विशेमार्य- इसका अभिप्राय यह है कि जो भव्य प्राणी छोटे-से छोटे भी जिनमंदिरका अथवा जिनप्रतिमाका निर्माण कराता है वह बहुत ही पुण्यशाली होता है। फिर जो भव्य प्राणी विशाल जिनमवनका निर्माण कराकर उसमें मनोहर जिनप्रतिमाको प्रतिष्ठित कराता है उसको तो निःसन्देह अपरिमित पुण्यका लम होनेवाला है।। २२ ।। संसारमें चैत्यालयके होनेपर अनेक मन्य जीव यात्राओं (जलयात्रा आदि) अभिषेकों, सैकडों महान उत्सवों, अनेक प्रकारके पूजाविधानों, चंदोबों, नैवेधों, अन्य उपाहारों, ध्वजाओं, कलशों, तौर्यत्रिकों (गीत, नृत्य, वादित्र ), जागरणों तथा घंटा, चामर और दर्पणादिकोंके द्वारा उत्कृष्ट शोमाका विस्तार करके निरन्तर पुण्यका उपार्जन करते हैं ॥ २३ ॥ वे मव्य जीव गदि अणुव्रतोंके भी धारक हों तो भी मरनेके पश्चात स्वर्गलोकको ही जाते हैं और अणिमा आदि ऋद्धियोंसे संयुक्त देवपदको प्राप्त करके चिर काल तक यहां (स्वर्गमें) ही रहते हैं । तत्पश्चात् महान् पुण्यकर्मके उदयसे मनुष्यलोकमें आकर और अतिशय प्रशंसनीय कुलमें उत्तम मनुष्य होकर बैराम्पको प्राप्त होते हुए वे समस्त परिग्रहको छोड़कर मुनि हो बाते हैं तथा इस सत्पुरुषः। ४श'सोनाति नास्ति। ५मजबनवत बमाशुवत । २-प्रतिपाठोऽयम् । मकश जैस्यालयं । समाना,श जयोनतमान। 'परा नाखि। पान १
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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