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________________ -3681४११] १. एकत्वलसति १२१ 365 ) अतिसूक्ष्मारिकामेकं मानेकमेन एन पी यसरमनक्षरम् ॥ ५८ ॥ 566) अनौपम्यमनिर्देश्यमममेयमनाकुलम् । शून्यं पूर्ण वयसिस्थमनिस्य च प्रचक्ष्यते ।। ५९ ॥ 367 ) निःशरीरं निरालम्ब निशम्य निरुपाधि यत् । चिदात्मक परंज्योतिरमाथानसगोचरम् ॥३०॥ 368) इत्यत्र गहने ऽस्पन्तदुर्लक्ष्ये परमात्मनि । उच्यते यचदाकाशं प्रत्यालेक्य बिलिख्यते ॥ ६ ॥ म्परापय-मार्गभ्रमगेन कृतश्रमम् उत्पन भ्रम खेदम् । नाशयन्तु स्फेटयन्त ॥ ५५ ॥ यत् ज्योतिः अतिसूक्ष्म प्रचक्ष्यते कृष्यते अमूर्तत्त्वात्। यज्योतिः अतिस्थूल प्रचक्ष्यते कथ्यते । कस्मात् । अनन्तगुणाश्रयत्वात् । यज्योतिः एक प्रवक्ष्यते शुद्रव्यार्थिन । यज्योतिः अनेक प्रचक्ष्यवे' कथ्यते गुणापेक्षया अथवा दर्शनज्ञानचारित्रतः । यज्योतिः खसंवेद्यम् । कस्मात् । सहजज्ञानपरिच्छेद्यत्वात् । यज्योतिः अवेद्यम् । कस्मात् । क्षायोपशामिकज्ञानेन अपरिच्छेयत्वात् । यज्योतिः अक्षर, म क्षरति इति अक्षर, विनाशरहितस्यात् । र पुनः । यज्योतिः अनक्षरम् । कस्मात् । अक्षररहितस्वात् । यज्योतिः अनौपम्यम् असाधारणगुणसहितत्वेन उपमातीतम् । यजयोतिः अनिर्देश्यम् । कस्मात् । कपितुमशस्यत्वात् । यज्योतिः अप्रमेयम् । कस्मात् । प्रभातुमशक्यचात् बा प्रमाणातीतत्वात् । यज्योतिः अनाकुलम् माकुलतारहितम् । यज्योतिः शून्य परपर चतुष्टयेन शून्यम् । च पुनः । यज्योतिः पूर्ण खचतुष्टयेन पूर्णम् । यज्योतिः नित्यं द्रव्यापेक्षया नित्यम् । यज्योतिः अनित्य पर्यायाधिकनयेन अनित्य प्रचक्ष्यवे' कप्यते ॥५८-५९ ॥ यत् परंज्योतिः । निःशारीरे शरीररहितम् । यज्योतिः निरालम्बम् मालम्बनरहितम् । यज्योतिः निःशब्दं शब्दरहितम्। यज्योतिः निरुपाधि उपाधिरहितमा यज्योतिःचिदात्मकम । गज्योतिः अवाचानसगोचरम अतीन्द्रियज्ञामगोचरम ॥ ६ ॥ इति पूर्वोत्तप्रकारेण । अत्र परमात्मनि विधये । यत् उच्यते कथ्यते तत् धाकाशे प्रति भालेय चित्रामं विलिख्यते मार्गमें परिभ्रमण करनेसे उत्पन्न हुई थकावटको दूर करें ॥ ५७ ॥ वह आत्मज्योति अतिशय सूक्ष्म भी है और स्थूल भी है, एक भी है और अनेक भी है, स्वसंवेद्य भी है और अवेद्य भी है, तथा अक्षर भी है और अनक्षर भी है। वह ज्योति अनुपम, अनिर्देश्य, अप्रमेय एवं अनाकुल होकर शून्य भी कही जाती है और पूर्ण भी, नित्य भी कही आती है और अनित्य भी ।। विशेषार्थ- आत्मज्योति निश्चयनयकी अपेक्षा रूप, रस, गन्ध और स्पर्शसे रहित होनेके कारण सूक्ष्म तथा व्यवहारनयकी अपेक्षा शरीराश्रित होनेसे स्थूल भी कही जाती है । इसी प्रकार वह शुद्ध चैतन्यरूप सामान्य स्वभावकी अपेक्षा एक तथा व्यवहारमयकी अपेक्षा मिन्न भिन्न शरीर आदिके आश्रित रहनेसे अनेक भी कही जाती है। वह स्वसंवेदन प्रत्यक्षके द्वारा जाननेके योग्य होनेसे स्वसंवेद्य तथा इन्द्रियजनित ज्ञानकी अविषय होनेसे अवेद्य भी कही जाती है। वह निब्धयसे विनाशरहित होनेसे अक्षर तथा अकारादि अक्षरोंसे रहित होनेके कारण अथवा व्यवहारकी अपेक्षा विनष्ट होनेसे अनक्षर भी कही जाती है। वही आत्मज्योति उपमारहित होनेसे अनुपम, निश्चयन्यसे शब्दका अविषय होनेसे अनिर्देश्य ( अवाच्य), सांव्यवहारिक प्रत्यक्षादि प्रमाणोंका विषय न होनेसे अप्रमेय तथा आकुलतासे रहित होनेके कारण अनाकुल भी है। इसके अतिरिक चूंकि यह मूर्तिक समस्त बाध पदार्थोक संयोगसे रहित है अत एवं शूल्य तथा अपने ज्ञानादि गुणोंसे परिपूर्ण होनेसे पूर्ण मी मानी जाती है, अथवा परकीय द्रव्यादिकी अपेक्षा शून्य और स्वकीय द्रव्यादिकी अपेक्षा पूर्ण मी मानी आती है। वह छ्यार्थिक नयकी अपेक्षा विनाशरहित होनेसे नित्य तथा पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा अनित्य मी कही जाती है ॥५८-५९ ॥ वह उत्कृष्ट चैतन्यस्वरूप ज्योति चूंकि शरीर, आलम्बन, शब्द तथा और भी अन्यान्य विशेषणोंसे रहित है; अत एव यह वचन एवं मनके मी अगोचर है ॥ ६० ॥ इस प्रकार उस परमात्माके दुरधिगम्य एवं अत्यन्त दुर्लक्ष्य ( अदृश्य ) होनेपर उसके विषयमें जो कुछ मी कहा जाता है वह आकाशमें चित्रलेखनके १ म माम्मनस्गोचरम्, पानामानसगोकरम् । २५ फोटबन्न । यस प्रनवे । ४ मास अविनाशल्याए ।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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