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________________ २. पानोपदेशनम् 202) माते ऽपि दुर्लभतरे ऽपि ममुख्यभाये खमेमसालसरशे ऽपि हि जीबितायौ। ये लोभकूपकुहरे पतिताः प्रवक्ष्ये कारुण्यता खत्यु तदुहरणाय किंचित् ।। 208) काम्तात्मजनविणमुल्यपदार्थसार्थप्रोत्थातिघोरधनमोहमहासमुन्द्रे । पोतायते गृहिणि सर्वगुणाधिकस्याहानं परं परमसाविकमाषयुक्तम् ॥५॥ 204) नानाजनाश्रितपरिग्रहसंभृतायाः सत्पात्रदानविधिरेव गृहस्पतायाः। हेतुः परः शुभगतेविषमे भवे ऽस्मिन् नायः समुद्र व कर्मठकर्णधारः॥ ६॥ सात् आकाशात् । एका अद्वितीया । पाश्चन्यमुनिपुंगवारणार्या श्रीवृषभदेवभोजनसमये । सा साहिः अभवत् । मी अगदेकचित्र-भाश्चर्य हेतुः । यया रस्लष्टया । धरित्री भूमिः । बहमतीत्वम् इता प्राप्ता बसुमतीनाम प्राप्ता ॥ ३॥ ये स्काः । मोभकूपकुहरे बिले । पतिताः । क सति । दुर्लभतरे मनुष्यभावे प्राप्ते सति । हि यतः । खगेन्द्रमामा जीवितादी प्राप्ते सति । ये भविक पतिताः । खलु निषितम् । तदुद्धरणाय तेषो जीवानाम् उद्धरणाय । साम्यतः दयातः । [विद] प्रवक्ये मिकि हानोपदेशकपयिष्यामि ॥ भो भष्याः श्रयता दानफलाम । गृहिणि गृहस्थे । पर केवलमा दान पोतावते पोत-प्रोरष इब थाचरति पोतामते । कस्मात् । सर्वगुणाधिकलात् । सर्वगुणानो मध्ये दानगुण प्रधानम् अधिकं तस्मात्सर्षगुणाषिकत्वात् । कि याणे वामम् । परमतत्वमाययुम् धौदायगुमनुका । किलक्षणे गृहस्थपदे। कान्ता-खी-आत्मत्र-पुत्र-द्रविण-द्रव्य-मुख्यपदार्यसमूहः तेभ्यः पदार्थसमूहेभ्यः । प्रोत्यम् उत्पन्नम् । घोरपनमोइमहासमुहप्राय समुसहशे। गृहपदे दाने प्रधानम् ॥५॥ मस्मिन् विषमे भवे संसारे । गृहस्थतायाः गृहस्थपदस्य । शुभगते. शुभपदस्य । परः उस्छः । हेतुः सत्पात्रदानविधिः अस्ति । एष निबयेन। किसक्षणामाः गृहस्थतायाः नामावनाश्रितपरिगृहसंमृतायाः नानाविधकुटुम्ब-नानाविधपरिगृहयुषयाः । यथा समुद्र कर्मठकर्णधारः चतुरखेटः । नापः प्रमहणस्य । शुभगतेः कारणम् अस्ति पारंगतकरणे समर्थ: 1 तथा धर्मः संसारसारणे समर्थः ॥॥ इन्बादिकोसे वन्दनीय एक प्रथम मुनिपुंगव ( तीर्थकर ) के पारणा करनेपर उस समय लोकको अभूतपूर्व भआश्चर्यमें डालनेवाली आकाशसे वह रहवृष्टि हुई कि जिसके द्वारा यह प्रधिकी 'वसुमती (धनवाली ) इस सार्थक संज्ञाको माप्त हुई थी; वह राजा श्रेयान् जयन्त होवे । विशेषार्थ- यह आगममें भली भांति प्रसिद्ध है कि जिसके गृहपर किसी तीर्थकरकी प्रथम पारणा होती है उसके यहां ये पंचाधर्म होते हैं-(१) रतवर्षा (२) दुंदुभीवादन (३) जय जय शब्दका प्रसार (४) सुगन्धित वायुका संशर और (५) पुष्पोंकी वर्षा ( देखिये ति. प. गाथा ४, ६७१ से ६७४)। तदनुसार भगवान् आदिनाथने जब राजा श्रेयान्के गृहपर प्रभम पारणा की थी तब उसके घरपर भी रनोंकी वर्षा हुई थी । उसीका निर्देश- यहां मी मुनि पमनन्दीने किया है ॥ ३ ॥ जो मनुष्य पर्याय अतिशय दुर्लम है उसके प्राप्त हो जानेपर मी तथा जीवित आदिके स्वम आर इन्द्रजालके सदृश विनश्वर होनेपर भी जो प्राणी लोमरूप अन्धकारयुक्त कुएंमें पड़े हुए हैं उनके उद्धारके लिये दयाल बुद्धिसे यहां कुछ दानका वर्णन किया जाता है ॥ ४ ॥ ओ गृहस जीवन स्त्री, पुत्र एवं धन आदि पदार्थोके समूहसे उत्पन्न हुए अत्यन्त भयानक व विस्तृत मोहके विशाल समुद्र के समान है उस गृहस्थ जीवनमें उत्तम सात्त्विक भावसे दिया गया उत्कृष्ट दान समस्त गुणोंमें श्रेष्ठ होनेसे नौकाका काम करता है । विशेषार्थ- इस गृहस जीवनमें प्राणीको बी, पुत्र एवं धन आदिसे सदा मोह बना रहता है, जिससे कि वह अनेक प्रकारके आरम्भोंमें प्रवृत्त होकर पापका संचय करता रहता है । इस पापको नष्ट करनेका यदि उसके पास कोई उपाम है तो वह दान ही है । यह दान संसाररूपी समुदसे पार होनेके लिये जहाजके समान है ॥५॥ इस विषम संसारमें नाना कुटुम्बी आदि जनोंके भावित परिप्रइसे परिपूर्ण ऐसी गृहस्य अवस्थाके शुभ प्रवर्तनका उत्कृष्ट कारण एक मात्र सत्पात्रदानकी १ मिच२ कर्मचारः। स 'म' नास्ति ।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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