SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 113
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १. धर्मोपदेशामृतम् 178) रायते परिदृढोऽपि दृढोऽपि मृत्युमभ्येति देवयशसः क्षणतो ऽत्र लोके । तत्कः करोति मदमम्बुजपत्रवारिविन्दूपमैर्धनकले. परजीविताद्यैः ॥ १७३ ॥ 174) प्रातर्भदलामकोटि घटितावश्यायबिन्दूत्कर 173 : १-१७५] प्रायाः प्राणधनाज प्रणयिनीमित्रादयो देहिनाम् । अक्षर्णा सुखमेतविषष विहाय स्फुटं सर्व भङ्गुरमत्र दुःखमहो मोहः करोत्यन्यथा ॥ ९७४ ॥ 175 ) तालाति वैरिणां प्रति चमूस्तावत्परं पौष तीक्ष्णस्तावदसिर्भुजौ दृढतरी तावच कोपोङ्गमः । भूपस्यापि यमो न यावदव्यः क्षुत्पीडितः सन्मुखं धावत्यन्तरिदं विचिन्त्य विदुषा तद्बोधको मृग्यते ॥ १७५ ॥ 1 हे मे । एतरकेशग्रहणापमानम्। त्वं मर्षसि सहसे। च पुनः 1 मम त्वं अद्यापि बेहला अहकारिणी असि । एतचित्रम् आर्यम् ॥ १७२ ॥ अत्र लोके संसारे । परितोऽपि राजा अपि । रङ्कायते । दृढोऽपि कठिनोऽपि । देववशतः कर्मयोगात् । क्षणतः । मृत्युम् अभ्येति मरणं याति । ततस्मात्कारणात् । अम्बुजपत्रवारिविन्दूपमैः कमलपोपरि जलबिन्दुसमानैः । धनकस्वर - शरीर जीविताद्यैः कृत्वा । म गर्वम् । कः करोति । भव्यः गर्व न करोति ॥ १७३ ॥ देहिनां प्राणिनाम् प्राणवनारूगजपुत्रप्रणयिनी स्त्रीशोत्रादयः प्रातःकालीन दर्भ आपको स्थित अवश्यायबिन्दु उत्कर समूहसदृशाः सन्ति । एतत् अक्षा सुखम् उप्रविषवत् जानीहि । अत्र संसारे स्फुटं प्रकटम् । धर्म विहाय सर्वम् । भगुरं विनश्वरम् । विद्धि । पुनः सर्व दुःखदं विद्धि । अहो मोहः अन्यथा करोति ॥ १७४ ॥ यावत् । अदयः श्रुत्पीडितः सन् यः सन्मुखं न धावति । तावद्भूरस्य राशः । चमूः सेना | वैरिणां प्रति वल्गति। भूपस्य अपि परं पौरुषं तावत् । भूपस्य असिः तीक्ष्णः तावत् । भूषस्य दृढतरौ भुज तावत् । * पुनः । कोपोद्रमः क्रोधोत्पत्तिः तावत् । यावत् यमः सन्मुखं न धावति । अन्तःकरणे इदं विचिन्त्य । विदुष! भव्यजीवेन । यह है कि वृद्धावस्थाके प्राप्त होनेपर पुरुषका शरीर शिथिल हो जाता है व स्मृति भी क्षीण हो जाती है। फिर भी वह विषयतृष्णाको छोड़ कर आत्महितमें प्रवृत्त नहीं होता, यह कितने खेद की बात है ॥ १७२ ॥ यहां संसारमें राजा भी दैवके वश होकर रंक जैसा बन जाता है तथा पुष्ट शरीरवाला भी मनुष्य कर्मोदयसे क्षणभर में ही मृत्युको प्राप्त हो जाता है। ऐसी अवस्था में कौन-सा बुद्धिमान् पुरुष - कमलपत्रपर स्थित जलबिन्दुके समान विनाशको प्राप्त होनेवाले धन, शरीर एवं जीवित आदिके विषयमें अभिमान करता है ! अर्थात् क्षण में क्षीण होनेवाले इन पदार्थोक विषय में विवेकी जन कभी अभिमान नहीं करते || १७३ ॥ प्राणियोंके प्राण, धन, पुत्र, स्त्री और मित्र आदि प्रातःकालमें डाभ ( कांस ) के पत्रके अग्र भागमें स्थित ओसकी बूंदों के समूहके समान अस्थिर हैं । यह इन्द्रियजन्य सुख तीक्ष्ण विषके समान परिणाममें दुःखदायी है । इसीलिये यह स्पष्ट है कि यहां धर्मको छोड़ कर अन्य सच पदार्थ विनश्वर व कष्टदायक हैं ! परन्तु आश्चर्य है कि यह संसारी प्राणी मोहके वश होकर इन विनश्वर पदार्थोंको स्थिर मान उनमें अनुराग करता है और स्थायी धर्मको भूल जाता है || १७४ | जब तक क्षुधासे पीड़ित हुआ निर्दय यमराज (मृत्यु) सामने नहीं आता है तभी तक राजाकी भी सेना शत्रुओंके ऊपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थान करती है, तभी तक उत्कृष्ट पुरुषार्थ भी रहता है, तभी तक तीक्ष्ण तलवार भी स्थित रहती है, तभी तक उभय बाहु भी अतिशय दृढ़ रहते हैं, और तभी तक क्रोध भी उदित होता है । इस असनं २ पीडितः यमः ।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy