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________________ १.धोपरेशासक सूचनमसापतीस्य यपदो विश्वप्रकाशात्मक सजीयास्सहर्ज सुनिष्कलमई शम्दाभिधेयं महः ॥ १६०॥ 161) यजायते किमपि कर्मयशादसात सातं च यत्तनुयायि विकल्पजालम् । जातं मनागपि न यत्र पदं सदेष देवेन्द्रवन्दितमहं शरणं गतोऽसि ॥ ११ ॥ 162) धिक्कान्तास्तनमण्डलं धिगमलपालेयरोचिः करान थिक'रविमिनचन्दनरसं मील जलादानि । यत्मा न कदाचिदा तदिदं संसारसंतापहर लग्नं दतिशीतल गुरषचोविष्यामृतं मे हदि ॥ १६ ॥ 163) जित्या मोहमहाभट भवपथे दचोप्रदुम्सश्रमे विश्वाम्ता विजनेषु योगिपथिका दीधै घरम्तः कमात् । महा मीयात् । किलक्षण महः। सहजम् । पुनः सुनिष्कलं शरीररहितम् । यत् महः । विमनसः सर्वज्ञाः । स्वयं जानन्ति। यत् चिपम् आनन्दसहित वीतरागा जानन्ति । क सति । हठात् मोहान्धकारे प्रोच्छिने सति । किंलक्षण महः । असकृत् निरन्तरम् । अनादि । अमन्दम् ससायमानम् । भहो यत् ज्योतिः । सूर्याचन्द्रमसौ अतीत्य उल्लल्य अतिक्रम्य विश्वप्रकाशात्मकं वर्तते ॥१६॥ महं तदेव पदम् । शरणं गतोऽस्मि प्राप्तो भवामि। किलक्षण पदम् । देवेन्द्रवन्दितमू 1 यत्किषि कर्मवशात् । भसात दुःखमूच पुनः । सात सुखम् । जायते उत्पद्यते। यत्तदनुयागिविकल्पजालं तयोः सुखदुःखयोः अनुयायि विकल्पजालम् । यत्र मोक्षपदे । मनागपि न जात मुकौ सुखदुःखविकल्पादिन वर्तते ॥ १६१॥ यदि चेत् । तत् इदं गुरुवचः दिव्यामृत मे हदि लमम् अस्ति तदा मया सर्व प्राप्तम् । किंलक्षण चोमृतम् । संसारसंतापहत् संसारकष्टनाशनम् । धुनः अतिशीतलमा यस्य गुरोः वधः । भत्र संसारे.. कदापित्र प्राप्तम् । यदा गुरुवाः प्राप्त तदा । कान्तास्तनमण्डल चिक् । अमलपालेयरोपिःकरान् चन्द्रकरान् धिक् । करविमिश्रितरन्दनरस विक् वा जलाओं चलाईव विक् । एवं गुरुवयः अमृतम् अस्ति ॥ १६३॥ नेभ्यो मुनिभ्यो नमः । रहित हुए सर्वज्ञ मयं ही जानते हैं, जो चेतनस्वरूप है, आनन्दसे संयुक्त है, अनादि है, तीन है, निरन्तर रहनेवाल है, तथा जो आश्चर्य है कि सूर्य व चन्द्रमाको भी तिरस्कृत करके समस्त जगत्को प्रकाशित करनेवाला है। वह 'अहम्' शब्दसे कहा जानेवाला शरीर रहित स्वाभाविक तेज जयवन्त हो ॥ १६० ॥ कर्मके उदयसे जो कुछ भी दुःख और सुख होता है तथा उनका अनुसरण करनेवाला जो विकल्पसमूह भी होता है वह जिस पदमें थोड़ा-सा भी नहीं रहता, मैं देवेन्द्रोंसे वन्दित उसी (मोक्ष) पदकी शरणमें जाता हूं ॥११॥ जो पूर्वमें कभी नहीं प्राप्त हुआ है, ऐसा संसारके संतापको नष्ट करनेवाला अत्यन्त शीतल गुरुका उपदेशरूप दिव्य अमृत यदि मेरे हृदयमें संलम है तो फिर पत्नीके स्तनमण्डलको धिक्कार है, निर्मल चन्द्रमाकी किरणोको थियार है, कपूरसे मिले हुए चन्दनके रसको धिक्कार है, तथा अन्य जल आदि शीतल वस्तुओंको भी विकार है । विशेषार्थ-खीका स्तनमण्डल, चन्द्रकिरण, कपूरसे मिला हुआ चन्दनरस तथा और भी जो जल आदि शीतल पदार्थ लोकमें देखे जाते हैं. वे सब प्राणीके बाब शारीरिक सन्तापको ही कुछ समयके लिये दूर सकते हैं, न कि अभ्यन्तर संसारसन्तापको। उस संसारसन्तापको यदि कोई दूर कर सकता है तो वह सहरुका वचन ही दूर सकता है । अमृतके समान अतिशय शीतलताको उत्पन्न करनेवाला यदि वह गुरुका दिव्य उपदेश प्राणीको प्राप्त हो गया है तो फिर लोकमें शीतल समझे जानेवाले उन स्त्रीके स्तनमण्डल आदिको धिक्कार है। कारण यह कि ये सब पदार्थ उस सन्तापके नष्ट करने में सर्वथा असमर्थ हैं ।। १६२ ॥ अत्यन्त तीन दुःख - - १-प्रतिपाठोडसम्म क विश्ता जकातामा। २६ निपलं। भकिलक्षणं पचः संसार। ४५ मिमिनचन्दन। ५ गद्रों विपरिका जाप पिच
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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