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सामाजिक व्यवस्था : कड़े पहनने की जानकारी मिलती है ।४४४ कड़े की आभा से किरणे निकला करती थीं, जिनसे हार्थों की हथेलियां आच्छादित हो जाती थीं । ८९ __अमिका ५०--(अंगूठो)-अंगूठो के साथ भारतवासियों की पता नहीं कितनी मधुर भावनायें लिपटी हुई है। कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तल में अंगूठी एक महत्त्वपूर्ण नाटकीय भूमिका अदा करती है। पद्मचरित के तैतीसवें पर्व में एक वर्णन माता है कि बचकर्ण ने मुनिसुव्रतनाथ भगवान की प्रतिमा से युक्त एक स्वर्ण की अंगूठी (ऊमिका) बनवाई तथा उसोके सहारे जिनेन्द्रदेव के अतिरिक्त अन्य किसीको नमस्कार न करने की महत्वपूर्ण प्रतिज्ञा निभाई।४२१
कटि के आभूषण काञ्ची-स्त्री की करधनी के लिए पद्मचरित में काञ्चौ ४१२ और मेखला दो शब्द आए हैं । आभूषण के रूप में तो इनका आकर्षण पा ही अनोवस्त्र को पथास्थान रखने में भी यह सहायक होती थी। काञ्ची धुंघरूदार सोने के कमरबन्द को कहते थे।४११ पद्मचरित में एक स्थान पर इसे मणिसमूह से सुशोभित कहा है ।१९४ मणियों को दानेदार करधनी को मेखला भी कहते थे । ५५
पैरों के बाभूषण नूपुर-परों के आभूषण के रूप में पद्मचरित में एकमात्र नूपुर का उल्लेख हमा है । राम के राज्याभिषेक का समाचार सुनकर स्त्रियां नूपुरों का शब्द फरती हुई, उत्तम वस्त्र धारण कर तथा पिटारों में वस्त्रालङ्कार लेकर आ गई।४५६ नपुर सादे या मणिमटित और मधुर मंकार करने वाले धरुओं से युक्त होते थे। नूपुर जल्दी से पहनाया-उतारा जा सकता था । ४९७
आर्थिक जीवन पद्मचरित का समाज एक सुव्यवस्थित समान है । सुव्यवस्थित समाज में जीविकोपार्जन अब्यबस्थित समाज को तरह कठिन नहीं होता है। अनेक प्रकार के कला-कौशल ऐसे समाज में विकसित हो जाते है। पद्मचरित में समाज की
४८८, पद्म० ३।३।।
४८९. पद्य० ३।३। ४९०. वही, ३३३१३१ ।
४९१. वही, ३३।१३१-१२३ । ४९२. वही, ८७२।
४९३. बही, ७१६६५ । ४९४. वही, ८1७२ । ४१५. शान्तिकुमार नानूराम व्यास : रामायणकालीन संस्कृति, पृ० ६१ । ४९६. पदमः २७।३२ । ४९७. शान्तिकुमार नानूराम व्यास : रामायणकालीन संस्कृति, पृ. ६१ ।