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________________ ७६ : पप्रचरित और उसमें प्रतिपादित संस्कृति तरह की कपास से बना वस्त्र बहा गया है । ३२ वासस्४३२-- ऋग्वेद" और बाद के साहित्य में पहनने के कपड़ों के लिए साधारणतः वारास शब्द का व्यवहार हुआ है । वसन और बस्त्र के भी बड़ी मा होते हैं । ४३५ अमरकोश में कपड़े के छ: पर्यायवाची यथा-वस्त्र, आच्छादन, वास, चैल, वसन और अंशुक नाम आए है । ४१ पदमचरित में वासम्,४३७ ४३२. आचारांग २२५. १, ३ अमरकोश में दुक्ल शीम का पर्यायवाची है और उसके आवरणों को निवीत और प्रावृत कहते थे। ऐसा लगता है कि लोग जब दुकल के अर्थ को भल गए. तब सभी महीन धूले वस्त्रों को दुगूल कहा जाने लगा। (अमरकोश २, ६, ११२, रघुवंश पर मल्लिनाथ की टोका १, ६५) हंस दुकूल गुप्तयुग की वस्त्र निर्माणकला का उत्कृष्ट नमूना था । आवारांग में एक जगह कहा गया है कि शक ने महावीर को जो हंस दुकूल का जोड़ा पहनाया था वह इतना हलका था कि हवा का मामूली झटका उसे उड़ा ले जा सकता था। इसकी बनावट की तारीफ कारीगर भी करते थे। वह कलावस्तु के तार से मिलाकर बना था और उसमें हंस के अलंकार पे (आचारांग २, १५, २०) । नावाषम्म कहाको के अनुसार यह जोड़ा वर्ण स्पर्श से सक्त, स्फटिक के समान निर्मल और बहुत हो कोमल होता था (नावाधम्म कहाओ १, १३) । मूल्यवान् कपड़ों के साथ दुकूल के जोड़े भी दिए जाते थे (अंतगड दसाओ १० ३२) दुकल के विषय में बाण ने लिखा है कि वह पुंडदेश (डबर्धनभुक्ति या उत्तरी बंगाल) से बनकर आता था। उसके बड़े-बड़े यान मे से काटकर चादर घोती या अभ्य वस्त्र बनाए जाते थे । बाण का पुस्तक वाचक सुदृष्टि इस प्रकार के कपड़े पहने था (दुगूलपट्टप्रभवे शिखंड्यपांगपांडुनी पांडूकाससी बसाना; ८५)। दुकूल से बने उत्तरीम, साड़ियाँ, पलंग की चादरें, तकियों के गिलाफ आदि नामा प्रकार के वस्त्रों का उल्लेख बाण के ग्रयों में माया है। सावित्री को दुकूल का वस्त्र पहने हुए (दुकूलवल्कलवसाना, १०) और सरस्वती को दुकूल वल्कल का उत्तरीय ओढ़े हुए (हृदयमुत्तरीय दुकूलवल्कलैकवेक्षेन संखादयन्ती) कहा गया है । पासुदेवशरण अग्रवाल : हर्षचरित एक सांस्कृतिक अध्ययम, पृ० ७७ । ४३३. पद्म० ३.२९३ । ४३४. ऋग्वेद १।३।४।११।११५॥४, ८।३।२४प्राचीन भारत की वेशभूषा, प.१५ । ४३५. ऋग्वेद १९५।७ । ४३६, अमरकोश २, ६, २१५ । ४३७, पद्म० ३।२९३ ।
SR No.090316
Book TitlePadmcharita me Pratipadit Bharatiya Sanskriti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRameshchandra Jain
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages339
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Culture
File Size6 MB
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