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________________ किन्नरोद्गोत ११९ जीमूतशिखर, २४५ श्रीगृह, " १४४ मत्यनुगीत, बहुरथ, मलय, भास्कराम, अरिजम, ज्योतिःपुर, शशिच्छाम, १४७ ९४२ १४० १५० ९४६ ९३९ ० ९४/५ ९४१. हो, ९४ ६ । १४३. वही ९४६ ॥ 1 सामाजिक व्यवस्था : १०५ འ༥བ गान्धार, श्री विजयपुर, पक्षपुर, १५१ तिलकपुर, १५२ १५४ लोकाअनगर, १ पृथिवीनगर, ९५३ शामली, कांचनस्थान, ' कोदालापुरी नगरों के नाम आए हैं मृणालकुण्ड, ९५९ १३० लौकिक मान्यतायें व प्रथायें ९४१ ९४५. वही ९४७ । P ९४७, वही ९४७ । ९४९. वही ९४७ । ९५१, वही ९४८ । ९५३. वही, ९३।१८४ । ९५५. वही १०९६९ । ९५७. वही १०८ ४० । ९५९. वही, ११०१ । ९६९. वही, ८३१९ । ९६२. नूनं मृत्युसमीपोऽसि सम्म बहसे गजे । ૧૪૨ ९४०. पद्म० ९४/५ । ९४२. वही, ९४६ ॥ ९४४. वहीं, ९४७ ९४६. वही, पद्मचरित से अनेक लोकिक मान्यताओं व प्रथाओं का निर्देश प्राप्त होता है, जो कि उस समय जनसाधारण में प्रचलित थीं । ये मान्यतायें निम्नलिखित हैं--- I ९६१ भूत-प्रेतों में विश्वास - अष्टम पर्व में कहा गया है कि नागवती के विरह में हरिषेण भूताकान्त मानव ( ग्रही) के समान इधर-उधर घूमने लगा ।' एक स्थान पर हरिषेण अञ्जनगिरि हाथी को जोकि महावत के वश में नहीं आर ने दी को पर ले जाने को कहता है कि जान पड़ता है कि तू मृत्यु के समीप पहुँचने वाला है इसलिए तो हाथी के विषय में गर्व धारण कर रहा है । अथवा तुझे कोई भूत लग रहा है। यदि भला चाहता है तो शीघ्र ही इस स्थान से चला जा एक अन्य स्थान पर अञ्जना की ओर आते हुए सिंह के विषय में कवि कल्पना करता हैक्या यह मृत्यु है ? अथवा दैत्य है अथवा कृतान्त है अथवा प्रेतराज है अथवा कलिकाल 112 ९४७ १ ९४८. वही ९४७ 1 ९५०. वही, ९४ ८ । ९५२. बही, ९४८ पुण्डरीकपुर, 'शालिग्राम,' १४३ ९४८ ९५३ १५८ ९५४. वही, १०१।५ । ९५६. वही, १०६ १३३ । ९५८. वही, १०९/५२ । ९६०. वही, ११८/५३ । गृहेण वा गृहीतोऽसि ब्रजास्मादाशु गोचरात् ॥ पद्म० ८३३३७ ।
SR No.090316
Book TitlePadmcharita me Pratipadit Bharatiya Sanskriti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRameshchandra Jain
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages339
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Culture
File Size6 MB
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