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________________ ३० न्यायविनिमयविवरण तरह भन्य योगी भी सर्वज्ञ हो सकते हैं यदि वे रागादिमुक्तिको सर सर्वशताके लिए भी यत्न करें। और जिनने वीतरागता प्राप्त कर ली है चाहं तो थोडेसे ही प्रयाससे सर्वज्ञ बन सकते हैं। शानारक्षित भी इसी सरह धर्मशता-साधन के साथ ही साथ सर्वज्ञता सिद्ध करके इसे शतिरूपसे सभी वीतरागोंमें मानते हैं। प्रत्येक कीसराग जब चाहे तब किसी भी वस्तुको अनायास यथेर जान सकता है। बुद्धने स्वयं अपनेको कभी सर्वश नहीं कहा। उन्होंने अनेक आत्मादि भतीन्द्रिय पदार्थोकी अम्याकृत कहकर उनके विषय, मौन ही रखा है। पर उनका यह स्पष्ट उपदेश था कि धर्म या मार्गका पूर्ण और निर्मल साक्षात्कार हो सकता है। धर्म मात्र किसी पुस्तकविशेषस ही जाननेकी चीज नहीं है। उन्होंने कभी अपनेको सर्वेश भी कहा है तो मार्गश या धर्मशके अर्थ में ही। उनका तो स्पष्ट उपदेश था कि मैंने तृणाक्षयके मार्गका साधारकार किया है और उसे ही बताता है। जैनतार्किकामे प्रारम्भसेही त्रिकाल त्रिलोकवर्ती पाचशेयोंके प्रत्यक्ष दर्शनरूप अर्थ में सर्वशता मानी है और उसका समर्थन भी किया है। बौर परम्परामें जिस प्रकार धर्मशसाका और सर्वशताका विश्लेषण करके धर्मशतापर मुख्य भार दिया गया है उस तरह जैन परम्परामें केवल धर्मशताका समर्थन न करके पूर्ण सर्वज्ञता ही सिद्ध की गई है। भाचार्य कुन्दकुन्दने प्रवधनसार' में केवलज्ञानको युगपत् अनन्तपदार्योका माननेवासा बताया है। वे भागे लिखते-कि जो एकको जानता है वह सबको जानता है। इस आत्मज्ञानकी परम्पराकी महक "यः आत्मवित् स सवित्" इत्यादि उपनिषद्- वाम तथा "जे एग जाणह से सब जाणा, जे सत्य जाणह से एग जाणह" इस पाचाराम सत्र (२३) में पाई जाती है। कुन्दकुन्दने इसका व्याख्यान करते हुए आगे लिखा है कि जो निकाल त्रिलोकवी पदार्थोकी नहीं जानता, वह पूरी तरह एक नभ्यको भी नहीं जानता । और जो अनन्त पर्यायवाले एक व्रम्पको नहीं जामसा वह सबको कैसे जान सकता है। इसका पुनः कालान्तरे तेषां सर्वगुणरागिणाम् । अस्पयत्नेन सर्वज्ञत्वस्य सिदिरयारिता ॥" प्रवार्तिकाल. ० ३२९ । १ "स्वर्गापवर्गसम्प्राप्तिहेतुशोऽस्तीति गम्यते । साक्षान केवलं किन्तु सर्वशोऽपि प्रतीयते ॥"-तत्त्वसं० श्लो० ३३०९। २"यद्यदिच्छति बोधु वा तप्तत्ति नियोगतः । शक्तिरेवंविधा तस्य प्रमाणावरणो खसौ ॥ युगपत् परिपाट्या व स्वेच्छया प्रतिपद्यते । लन्धशार्न च सिस्वी (१) हि सक्षणादिभिः प्रभुः ॥"-तत्त्वसं० पलो ३६२८-२९। ३ "स भयवं उप्पण्णणाणदरिसी सदेवासुरमाणुस्सलोगस्त आगदि गदि चयणोववाद बंधमोक्खं हदि दिदि अदि अणुभागं तक कलं मण माणसि भुसं कदं पडिसेवितं आदिकम्भ अराकर्म सलोए सम्वजीधे सम्बभावे समं जाणादि पस्सदि विहरदि ति"-प्रकृति अनु। ___ "से भगवं अरदं जिणे केवी सम्वन्नू सवभावदरिसी सदेवमणुयासुरस लोगस्स परमाए जाण । तं वागई गई लिई चयणं उववाय मुचं पीय कई परिसेवि आविकम्म रहोकम्म लवि कहिलं मणो माणखि सबलोए सस्वजीवाणं सब्वभावाई नापमाणे पासमाणे एवं चविहर।" -आचाभु.२~०३। ४" तकालियमिदरं जाणदि जुगवं समंसदो सध्यं । अत्य विचित्त विसमं तं पाण खात्यं भणिय ||"-प्रब० ॥४७॥ ५ "जो ण विजाणदि जुगवं अन्ये तेकासिक तिवणत्थे। ___णादु तस्स | सक्क सपजयं दध्वमेकं था।"-प्रवtive ६ "दब्वमणंतपज्जयमेकमर्णवाणि दध्वजादाणि । गवि जाणादि जदि शुगर्व कप सो सम्वाणि जाणादि।"-प्रा. १/४९।
SR No.090313
Book TitleNyayavinishchay Vivaranam Part 2
Original Sutra AuthorVadirajsuri
AuthorMahendramuni
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages521
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size13 MB
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