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________________ म्यायधिनिश्चयविवरण को नीचा देखकर सरे पलदेके ऊँचे होनेका अमुमान, रस वखकर रूपका अमुमान और साहमासे गीका अनुमान सहचरतुसे होते हैं। इनमें अपने साध्यौके साथ म तो तावात्म्य सम्बन्ध है और न तदु. स्पतिही। अनुपलब्धि- बीश्यामुपलधिसे भभावकी सिक्षुि मानते हैं। हश्यसे उनका तात्पर्य ऐसी वस्तुसे है जो वस्तु सुरुम, भन्तरित और विपकृष्ट-दरवर्ती न हो तथा प्रत्यक्षका विषय हो सकती हो। ऐसी वस्तु उपविधके समस्त कारण मिलनेपर अवश्य ही उपलब्ध होती। उपलब्धिके शल्प समस्त कारण रहनेपर भी यदि वह परतु उपलब्ध हो तो उसका अभाव समझना चाहिए । सूक्ष्मावि पदाथों में हमलोगों के प्रत्यक्ष भाविकी निवृत्ति होनेपर भी उनका अभाव नहीं माना जा सकता। प्रमाणसे प्रभेयकी सिदिशी होती है पर प्रमाणाभावसे प्रमेयका प्रभाव नहीं किया जा सकता। अत: महश्य पदार्थकी अनुपलब्धि संशयका हेतु होनेसे अभावको सिद्ध महीं कर सकती। अकलकदेखने इसकी स र जमा करू यक्षविषयस्व ही नहीं लेना चाहिए कि उसकी सीमा प्रमाणविषयरव तक करना चाहिए। इसका फरितार्थ यह है कि जो वस्तु जिस प्रमाणका विषय है वह यदि उसी प्रमाणसे उपलब्ध न हो तो उसका अभाव सिद्ध होगा । मृत शरीरमें सभाबसे मतीन्द्रिय परचैतन्यका भभाष हम व्यापार बचन आदि बेटाओंका अभाष देखकर ही करते हैं। पहाँ चैतम्यमें प्रत्यक्षधिपयरवरूप रश्यश्व तो नहीं है, क्योंकि परतन्य हमारे प्रत्यक्षका विषय कभी नहीं होता। जिन चेष्टाओंसे उसका भनुमान किया जाता है उन्हींका अमाव देखकर उसका भभाष सिद्ध करना म्यायप्राप्त है। यदि अहश्यानुपलब्धि एकान्ततः संशय हेतु हो तो मृत शरीरमें चैतन्यकी निवृत्तिका संदेड सड़ा बना रहेगा। ऐसी हालत दाहसंस्कार करनेवालीको हिंसाका पाप झारमा चाहिए । हाँ, जिन विशावादिकोका सद्भाष हम किसी भी प्रमाणसे न जान सके ऐसे सर्वथा कश्य-प्रमाणागम्य पदार्थोंका भभाष भनुपलम्धिसे नहीं किया जा सकता। अतः जिस वस्तुको हम जिन बिन प्रमाणोंसे जानते है उस पस्तुका हम उन प्रमाणों के अभाव में अवश्य ही अभाव सिद्ध किया जा सकता है। भककवने प्रमाण संग्रह (पु.१०४-५)में सनाव साधक ९ उपलब्धियोको सथा अभावसाधक १ अनुपलब्धियोको कण्टोक्त कहकर शेष अनुपलविधके भेदमभेदोंकाइनों में असर्भाव किया है। वे इस प्रकार है १ स्वभावोपसम्धि-पारमा उपलब्ध होनेसे। २ स्वभावकार्योपसम्धि-आत्मा थी. स्मरण होनेसे । ३ स्वभावकारणोपकम्धि-आमा होगी सत् होनेसे । सहचरोपलब्धि-आत्मा है, स्पर्णविशेष (शरीरमैं अषणताविशेष)पाये जानेसे । ५ साचारकापोंपलब्धि-काय-म्यापार हो रहा है, वचन-प्रवृत्ति होनेसे। ६ सहवाकारणोपलब्धि-आमा सप्रदेशी है. साथ शरीरके प्रमाण होनेसे। असव्यवहार साधनके लिप ६ अनुपलब्धियाँ१ स्वभावानुपलब्धि-क्षणक्षकान्त नहीं है, अनुपलब्ध होनेसे । २ कार्यानुपलब्धि-क्षणक्षयकान्त नहीं है, उसका कार्य नहीं पाया जाता। १ कारणानुपलब्धि-क्षणक्षकाम नहीं है, उसका कारण नहीं पाया जाता। ४ स्वभावसहचरानुपलग्धि-आस्मा नहीं है, रूपविशेष (परीरमें प्राकारविशेष) नहीं पाया जाता। १ न्यायवि० रा२६ । २ापी० श्लो०१५। ३ अष्टश, असहपृ०५२!
SR No.090313
Book TitleNyayavinishchay Vivaranam Part 2
Original Sutra AuthorVadirajsuri
AuthorMahendramuni
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages521
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size13 MB
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