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________________ प्रस्तावना १७ किया है। पर इस तरहका परम्पराश्रित लम्बा प्रयास करनेसे पृथ्वी रूप धमकी अपेक्षा महाभसंगत धूम हेतुसमुद्रम करने पवरहित नहीं होगा। व्यभिचारीकाल अवकाश पृथ्वी आदिको अपेक्षा पध घटाया जा सकेगा। यद्यपि घ्यासिके हिस्पांति, अन्तष्वति और सकलण्यास ये तीन मंत्र किये जाने है पर इनमें केवलन्तीलिए आवश्यक है। पक्षमें और साधनको व्यासको अन्तयति कहते हैं | पक्ष में साध्यसाधनको व्यासि महिष्यप्ति और पक्ष तथा रूपक्ष दोनों में होनेवाली याति सकलव्यति कहलाती है। अस्तयति असिद्ध रहनेपर बहिन्यांत निरर्थक है अतः यतिका प्रयोजक-पक्ष व रूप भी अवश्य ही है। अतः पाकेसरी स्वामीने ही कहा है कि जहाँ अन्ययानुपपति नहीं है वहीं रूप्य माननेसे क्या और जहाँ अन्यथानुपपति है वहाँ वैरूप्य मानने से क्या सरी स्वामी अनुपपचस्य कारिका अपने न्यायविनिश्चयम से ही है। इसका अनुकरण करके विद्यानन्द स्वामीने प्रमाणपरीक्षा ( पृ० ०२ ) में लिखा है कि जहाँ अन्यधामुपसत्य है वहाँ पस्वरूप माननेसे क्या और वहाँ अन्यथानुपपत्य नहीं है वहाँ परूप गामने क्या ? बीटू' अविनाभावको साम्य और तत्पत्तिसे नियत मानते हैं। उनके मनसे हेतुके तीन भेद हैं- कार्यहेतु, स्वभावहेतु और अनुपलब्धिहेतु । इनमें स्वभावहेतु और कार्यहेतु विधिसाधक है तथा अनुपलधिहेतु निषेध साधक । स्वभावहेतु तादाम्य सम्बन्ध कार्यहेतु सदुत्पत्ति सम्बन्ध और अनुपलब्धिरे यथासम्भव दोनी सम्बन्ध अविनाभाव के प्रयोजक होते हैं। देवने इसकी आलोचना करते हुए लिखा है कि जहाँ तादात्म्य और तदुत्पतिसम्बन्धसे हेतुमें गमकता देखी जाती है यहाँ अविनाभाव तो रहता ही है, भले ही वहाँ यह अविनाभाग तादात्म्य याणि प्रयुक हो पर बहुत से ऐसे भी हेतु हैं जिनका साध्य के साथ साम्य या तदुत्पतिसम्बन्ध होनेपर भी मात्र अविनाभावसे वे अपने नियत साध्यका ज्ञान कराते हैं, जैसे कृतोय आदि पूर और उत्तरवर हेतु किती भरणी उदयका अनु तथा भविष्यत् पाटोदयका अव्यभिचारी अनुमान देखा जाता है पर इनमें न तो सादालय सम्बन्ध है और न ही हेतुके भेद-देवने सामान्यतया के उपलब्धि और अनुपलब्धि से दो भेद किये है। दोनों ही प्रकार के हेतु विधि और निषेध दोनोंको सिद्ध करते हैं। उपलब्धि के स्वभाव, कार्य, कारण, पूर्वपर, उत्तरपर और सहचर मे ६ भेद है। १ स्वभावहेतु - यह वृक्ष है शिशपा होनेस | पर्वत अग्नि है धूम होमेसे कारण-वृक्ष छायाका ज्ञान और चन्द्रमाले जल पदवले उसके प्रतिबिम्वका ज्ञान कारण है। यद्यपि कारण अवश्य ही कायको उत्पन्न करे वह नियम नहीं है क्योंकि कारणोंकी सामर्थ्य रुकावट तथा सामग्री के अन्तर्गत कारणान्तरॉकी विकलता देखी जाती है किन्तु ऐसे कारणसे जिसकी शक्ति में कोई प्रतिबन्ध न हो और कारणान्तरोंकी विकलता न हो, कार्यका अनुमान होता ही है। अनुमान करनेवालेकी अाकि अनुमानको दोष नहीं दिया जा सकता | ४ पूर्व घर कृतिका नक्षत्रका उदय देखकर एक मुहूर्त के बाद रोहिणीका उदय होगा यह अनुमान पूरानुमान है। यहाँ कृषिकोदय और भावी शकchar में न तो तादात्म्य सम्बन्ध है और नाकारण भाव ही अतः इसे पृथ हेतु ही मानना चाहिए। ५उत्तरच हेतुः कृतिकाका उदय देखकर एक मुहूर्त पहले भरणीका उदय हो चुका है। यह अनुमान उत्तरचरानुमान है। ६ सहचर हेतु चन्द्रमाके इस भागको देखकर उसके उस भागका अनुभाग, तराजू एक पड़े १ प्रमाणसं ० इलो ५०। २ सिडि दी० लि. हेतुलक्षणसिद्धि परि० । तस्त्र संका १३६४ | ३ न्यायवि० २।२५ ३
SR No.090313
Book TitleNyayavinishchay Vivaranam Part 2
Original Sutra AuthorVadirajsuri
AuthorMahendramuni
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages521
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size13 MB
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