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________________ १८४ न्यायरत्न : न्यायरत्नावली टीका : षष्टम अध्याय, सूत्र २३-२४ हिन्दी व्याख्या-व्युत्पत्ति भेद के बिना पर्यायवाची शब्दों के अर्थ में भिन्नता का प्रतिपादन नहीं किया जा सकता है। अतः इस सूत्र में 'व्युत्पत्ति भेद' ऐसा पद गतार्थ होने से नहीं कहा गया है वह तो स्वयं ही अध्याहत हो जाता है इस तरह व्यत्पत्ति के भेद को लेकर जो नय इन्द्र शक पुरन्दर आदि समान अर्थ वाले शब्दों का एक अर्थ न मानकर उनका प्रत्येक का भिन्न-भिन्न अर्थ मानता है बह समभिरूढनय है । शब्दनय के अभिप्रायानुसार समानलिंग वाले ये इन्द्रशादिक शब्द एक अर्थ के बाचक माने गये हैं परन्तु समभिरूढनय का अभिप्राय ऐसा है कि घोड़ा घट, कट-चटाई आदि भिन्न-भिन्न शब्द जिस प्रकार भित्रभिन्न अर्थ के बाचक होते हैं उसी प्रकार पर्यायवाची शब्द भी भिन्न-भिन्न शब्द होने के कारण भिन्न-भिन्न अर्थ के ही वाचक होते हैं । यद्यपि वस्तुस्थिति ऐसी है कि कोई भी इन्द्रादि शब्द केबल पर्यायरूप अर्थ का ही वाचक नहीं होता है किन्तु द्रव्यविशिष्ट पर्याय का ही बाचक होता है परन्तु यह नय उसमें द्रव्यवाचकता को गौण करता हुआ पर्यायवाचकता की प्रधानता कर देता है इस तरह यह नय उन इन्द्रादिक शब्दों के वाच्यार्थ में भिन्नता का समर्थक होता है । इस नय के मत में न एक शब्द के अनेक अर्थ होते हैं और न अनेक शब्दों का एक अर्थ होता है ।। २२ ।। सूत्र-पर्यायवाचिषु भित्रार्थत्वमेव समर्थयमानस्तदाभासः ।। २३ ।। संस्कृत टीका-सर्वेऽपि पर्यायवाचकाः शब्दा भिन्नार्थाभिधायिन द्रव्यापेक्षयाप्यभिन्नार्थाभिधायका न भवन्ति करिकुरङ्गतुरङ्गादि शब्दवत् इत्येवं समर्थयमानोऽभिप्रायस्तदाभासः-समभिरूढनयाभासो वस्तुमात्रस्यव सामान्य विशेषधर्मात्मकतया सामान्यधर्मापेक्षयाऽनेनाभिन्नार्थस्य निराकृतत्व हिन्दी व्याख्या-- जितने भी पर्यायवाची शब्द हैं वे सब ही भिन्न-भिन्न अर्थ के ही कहने वाले हैं एकार्थ के नहीं । इस प्रकार से जो नय एकान्तरूप से अपनी ही मान्यता का प्रतिपादन करता है और उसी का समर्थन करता है तथा दूसरे नया को मान्यता काखण्डन करता है वह समभिरूढनयाभास है 1कार, हाथी कुरङ्ग-हिरण और तुरङ्ग ये सब ही शब्द अपने-अपने भिन्न-भिन्न वाच्यार्थ के जिस प्रकार से प्रतिपादक हैं उसी प्रकार से इन्द्र शब्द अपने ऐश्चर्यविशिष्ट वाच्यार्थ का, शक्र सामर्थ्य विशिष्ट वाच्यार्थ का और पुरन्दरनगरविध्वंस करने रूप बाच्यार्य का प्रतिपादक होता है क्योंकि प्रत्येक शब्द अपने व्युत्पतिभेद से ही अर्थ का कथक होता है फिर इनमें किसी अपेक्षा भी एकार्थकता नहीं आ सकती है इस प्रकार का इस नयाभास का अभिप्राय होता है । यह इस बात को बिलकुल स्वीकार नहीं करता है कि प्रत्येक वस्तु सामान्य और विशेष धमों से ओतप्रोत है । अतः सामान्य द्रव्य की अपेक्षा शब्द के वाच्यार्थ में अभिन्नता एकार्थकता में सकती है, प्रत्युत यह तो उस मान्यता का निराकरण ही करता है। इसी कारण इस प्रकार के अभिप्राय को समभिरूढनयाभास कहा गया है । समभिरूढनय अपने अभिप्राय का कथन करता हुआ भी इतरनय के अभिप्राय का निराकरण खण्डन नहीं करता है । इस कारण बह सुनय कोटि में रखा गया है ।। २ ।। सत्र-एवंभूतमर्थ स्ववाच्यत्वेनकक्षीकुर्वाणो विचारो ह्येवंभूतः ।। २४ ।। संस्कृत टोका-एवंभूतनयाभिप्रायेण यावन्त शब्दाः स्वार्थाभिधायकाः सन्ति ते सर्वेऽपि प्रकृतिप्रत्ययसंभूता एवातः प्रत्येक शब्दाक्रियार्थोऽभिव्यक्तो भवति । यस्माच्छन्दाद् यस्याः क्रियाया अर्थों भावो वा प्रकटितो भवति तया त्रियाया समन्वितोऽर्थस्तेन शब्देन तदा नाच्यो जायते । अयमेवाभिप्राय एवंभूतशब्दस्यात्र सूचितो भवति प्रसङ्गवशात् । तथा सति अयमों लब्धो जायते यदेन्दनादिक्रियापरिणत इन्द्रो भवति तदैव स इन्द्रपदवाच्यो भवितुमर्हति नान्यक्रियापरिणतिसमये नरेन्द्रशब्द प्रवृत्तिनिमित्तीभूतक्रियापरिणत्य
SR No.090312
Book TitleNyayaratna Sar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherGhasilalji Maharaj Sahitya Prakashan Samiti Indore
Publication Year
Total Pages298
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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