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________________ १७८ ज्यायन : न्यायरत्नावली टीका : षष्ठम अध्याय, सूत्र १५-१६ हिन्दी व्याख्या-यह पहले प्रकट किया जा चुका है कि संग्रहनय परसंग्रहनय और अपरसंग्रहनय के भेद से दो प्रकार का है । परसंग्रहनय का विषय सत्ता महासत्ता है और अपरसंग्रहनय का विषय अवान्तर सत्ता है। परन्तु व्यवहारनय का ऐसा अभिप्राय है कि लौकिक व्यवहार न परसामान्य से चलता है और न अपरसामान्य से चलता है वह तो सत्ता के विशेषों से या अपरसत्ता के बिशेषों से ही चलता है। अतः व्यवहारनय उस परापरसत्ता को भेद और प्रभेदों में विभक्त करता है और उन्हें व्यवहारोपयोगी प्रकट करता है। वह कहता है यद्यपि मनुष्य कहने से सभी मनुष्यों का वर्गीकरण हो जाना है परन्तु जब उनका विशेषरूप से ज्ञान कराना होता है या व्यवहार में उनका भिन्न-भिन्न रूप से उपयोग करना होता है तब उनका विधिपूर्वक विभाग किया जाता है 'विधाय" यह पद यह प्रकट करता है जिस विधि से इनका संग्रह किया गया है उसी विधि से इनका विभाग किया जाता है । जैसे-जब परसंग्रहनय सत्ता मात्र से समस्त पदार्थों का वर्गीकरण कर लेता है तब व्यवहारनय उससे ऐसा पूछता है कि जो सत् है वह द्रव्य रूप है या पर्यायरूप है ? यदि वह द्रव्यरूप है नो क्या वह जीव द्रव्यरूप है या अजीव द्रव्यरूप है ? यदि जीवद्रव्यरूप है तो क्या वह सजीव रूप है या स्थावरजीव रूप है ? यदि वह प्रसनीय रूप है तो क्या वह द्वीन्द्रियजीव रूप है या पञ्चेन्द्रिय जीवरूप है ? यदि पञ्चेन्द्रिय जीवद्रव्य रूप है तो क्या मंज्ञी पञ्चेन्द्रिय जीवरूप है या असंज्ञो पञ्चेन्द्रिय जीवरूप है । इस रूप से बह व्यवहारनय परापर सामान्य के यहाँ तक भेद प्रभेद करता हुआ चला जाता है कि फिर द्वितीय भेद करने की आवश्यकता नहीं रहती है क्योंकि वह नय लोकव्यवहार विशेषों से ही चलता है सामान्य से नहीं । दूध गाय विशेष से ही दुहा जाता है सवारी घोड़े पर ही की जाती है, गोत्व से दूध नहीं दुहा जाता है और न अश्वत्व को सवारी के काम में लिया जाता है" ऐसा कहता है ।। १५ ।। सूत्र-काल्पनिक द्रव्यपर्याय विभागाभिप्रायस्तदाभासः ।।१६।। संस्कृत टीका-द्रव्यपर्यायविभागः काल्पनिक: अपरमार्थभूत एवं वर्तते एवं मन्वानोऽभिप्रायो व्यवहारनयाभासः । इदं सुवर्णादिक द्रव्यं कटककुण्डलादिकोऽयं पर्याय इत्येवं रूपो व्यवहारो न पारमाथिकः काल्पनिकत्वाद् द्विचन्द्रदर्शनवत् भ्रमवशादेव प्रतीयते द्रव्यपर्यायधिभागः । अयं व्यवहारमयाभासश्चार्वाका सिद्धान्तः-तत्र पृथिव्यप्तेजोवाटवात्मक भूतचतुष्टयमेव वास्तविकरूपत्वेन निगदितमेतदतिरिक्तः सर्वोऽपि द्रव्यपर्यायविभागो वारवधूबिलासवन्मनोरंजकमात्रमेव न लोकयात्रानुयायी प्रत्यक्षतोऽप्रतीयमानत्वात् प्रत्यक्षतो यदेव प्रतीयते घटादिकं वस्तु तदेव वास्तबिकं न ततोऽतिरिक्तमनुमानगम्यं किञ्चिदपि वस्तु एवं च प्रत्यक्षतः परिदृश्यमानं शरीरमेव जीबन ततो व्यतिरिक्तः परलोकानुयायी चेतनरूपो जीवः परलोकाभावात् प्रमाणाभावाच्च पुण्य पापमपि नास्ति इत्यादि रूपश्चार्वाकराद्धान्तो व्यबहारनयाभास स्वरूपः ।।१६।। अर्थ- द्रव्य और पर्याय का विभाग केवल काल्पनिक ही है ऐसा जो अभिप्राय है वही व्यवहाराभास है ॥१६॥ हिन्दी व्याख्या-द्रव्य और पर्याय का विभाग सत्य है काल्पनिक नहीं है ऐसा जो अभिप्राय है वह व्यवहारनय है, इस व्यवहारनय के साथ विपरीत व्यवहार करने वाला व्यवहारनयाभास है। इसकी दृष्टि में यह मुवर्णादि द्रव्य है ये इसकी कटककुण्डलादि रूप पर्यायें हैं इस प्रकार का जो जगत् प्रसिद्ध व्यवहार है वह पारमार्षिक नहीं है, द्विचन्द्रदर्शन की तरह वह केवल कल्पना का ही विषय है क्योंकि भ्रम के बश से ही यह द्रव्यपर्याय विभाग प्रतीत होता है, इस व्यवहारनयाभास में चार्वाक का सिद्धान्त परि
SR No.090312
Book TitleNyayaratna Sar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherGhasilalji Maharaj Sahitya Prakashan Samiti Indore
Publication Year
Total Pages298
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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