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म्यायरल : न्याम रलावली टीका : चतुर्थ अध्याय, सूत्र ३१
|११६ हेतुद्वयेन तत्र सामान्यविशेषात्मकत्वम् अनुवृत्त ब्यावृत्त त्यादिरूपेण सूत्रकारः साधयति । कृष्णधवलशवलादिवोंपेल गोव्यक्तिष परस्परं कृष्णत्वधवलत्वशबलस्वादिना भिन्नत्वेऽपि "अयमपिगौरयमपिगौः" इत्येवं रूप समानाकारानुवृत्ति बुद्धि विषयत्वेन गोत्वादि सामान्यस्यः अषं शबलो गौः ननु श्यामः नापि शुक्ला इत्येवं रूप परस्पर व्यावृत्ति बुद्धि विषयत्वेन शबलत्वादि गुण रूप विशेषस्य च सिद्ध या गवादि वस्तुनः सामान्यविशेषात्मकत्वं सिध्यति, मिर्मिणोरेकान्ततो भिन्नत्वाभावेन कञ्चिदभिन्नत्वात् । तवायं गौरयंगौरित्याकारा सदृशपरिणति रूप गोस्वादि सामान्य विषयिणी प्रतीतिरनुवृत्ताकारा प्रतीतिग्वगन्नन्या, श्यामोऽयं शवलोऽय गौरित्यादि स्वरूपा श्यामत्व शबलत्वादि गुण रूप विशेष विषयिणी प्रतीतिः व्यावत्ताकारा प्रतीतिरबगन्तव्या । एवं रीत्याऽनुवृत्त व्यावृत्त प्रतीति विषयत्वान् प्रमाण विषयभूतोऽर्थः सामान्य विशेषात्मको भवति ।
एवमपि पदार्थः पर्यायरूप तयोत्पन्नो विनष्टो भवनपि द्रव्यरूपतया ध्रुवम्हपोऽपि भवति-यथा सुवर्णपिण्डः पूर्वपिण्डाकारं परित्यज्य कटक कण्डलादिमपं पर्यायं धारयन्नपि पूर्वपिण्डाकार कुण्डलादि रूपोतरपर्यायेषु च सवर्णल्वरूप धोव्यात्मना स्थिरो भवति । एवं रूपया परिणत्यार्थक्रियाकारित्वं सुवर्णद्रव्येषु आयानि । एतेन बक्ष्यमाणतिर्यगुता सामान्यात्मकत्वं विणवात्मकत्वं च वस्तुन्यभिहितं ज्ञातव्यम् ।।३।।
हिन्दी थ्याख्या--प्रमाण का विषयभूत पदार्थ मामान्यविशेषात्मक है इसी बात को हेतुपूर्वक समर्थित करने के लिए सुत्रकार ने इस सूत्र का निर्माण किया है । इसके द्वारा यह समझाया गया है कि प्रत्येक पदार्थ में अनुवृति प्रत्यय विषयता और व्यावृत्ति प्रत्ययविषयता है इसलिये पदार्थ सामान्य विशेष धर्मात्मक है । इसका तात्पर्य ऐसा है कि जैसे—कृष्ण, धरल, शबलादि वर्णोपेत गोव्यक्तियों में परस्पर में कृष्णत्व, धवलत्वादि वर्गों की अपेक्षा भिन्नता होने पर भी जो उन सब में यह भी गाय है यह भी गाय है इस प्रकार की सदृशता की बुद्धि होती है एवं एक शब्द वाच्यता आती है-यह सामान्यरूप धर्म को आश्रित करके ही आती है । तथा यह गाय शवल है, काली नहीं है, मफेद भी नहीं है इस प्रकार की जो उनमें एक दूसरे से भिन्नता की बुद्धि होती है वह विशेष धर्म को लेकर ही होती है । इस तरह गाय आदि प्रत्येक पदार्थ सामान्य विशेष धर्मात्मक है यह कथन सिद्ध हो जाता है। क्योंकि धर्म और धर्मी में कथंचित् 'अभिन्नता भी स्वीकार की गई है । अतः यही मानना युक्तिसंगत है कि गाय आदि पदार्थों में जो सहन आकारता की प्रतीति है वह सामान्य धर्म को एवं गाय श्याम है, धबल नहीं है इस प्रकार की आपस में जो भिन्नता की बुद्धि है वह विशेष धर्म को विषय करती है। इससे प्रमाण का विषयभूत पदार्थ समान्य विशेष रूप है, तथा दूसरी बात यह भी है प्रत्येक पदार्थ उत्पाद, व्यय और प्रौव्य इन से बिहीन नहीं है । मृत्तिक से जब घट बनता है तब मत्तिका के पूर्व आकार का विनाश होता है। पूर्व आकार के बिनाश में और उत्तराकार रूप घट की उत्पत्ति में मत्तिका का स्थायित्व माना जाता है। यही बात सनस्थ हान, उपादान और अवस्थान शब्दों द्वारा प्रकट की गई है। घटरूप परिणमन और पूर्वाकार म्प परिणमन ये आपस में भिन्न-भिन्न है यह भिन्नता ही मुत्तिका द्रन्ग में विशेषधर्म के सद्भाव प्रकट करने में प्रमाणभुत युक्ति है तथा पूर्व अवस्था में और उत्तर अवस्था में मृत्तिका का स्थायित्व रहना यह सामान्य धर्म के उसमें रहने में प्रमाणभूत युक्ति है । इस तरह सामान्य विशेष धर्मात्मक पदार्थ ही अर्थक्रियाकारी माना गया है । घट के द्वारा जल लाना, उसमें जल भरकर रखना, मुत्तिका से घटादि का निर्माण होना आदि जितने भी लौकिक व्यवहार चलाने के कार्य हैं ये सब उस-उस पदार्थ की अर्थक्रियाएं हैं। पूर्वोक्न रूप मे पदार्थ व्यवस्था न मानने पर पदार्थ में अर्थक्रिया करने की विहीनता का प्रसंग प्राप्त होता है ।