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________________ ११०। न्यायरत्न : न्यायरत्नावली टीका : चतुर्थ अध्याय, सूत्र २५ नहीं क्योंकि दोनों में क्रमशः बलवत्ता उसे प्रती तिकोटि में आ गई है परन्तु उसकी बलबत्ता का व्याख्यान वह उन दोनों में एक साथ नहीं कर पाती है अतः उस अपेक्षा वे दोनों ही अववतव्य कोटि में आ जाते हैं । अबक्तव्य कोटि में आने पर भी वे दोनों अपनी-अपनी अपेक्षा स्वतन्त्र रूप से बलशाली भी हैं और पररूप से बलशाली नहीं भी हैं। इस अपेक्षा वे ५व और ६खें भंग की श्रेणी में आ जाते हैं। तथा एवं युगपत् क्रमशः बलवत्ता की स्थिति में वे दोनों ७वें भङ्ग की श्रेणी में आ जाते हैं। इस तरह इस रूपक के अनुसार जब तक हम किसी भी बस्तुगत एक धर्म की छानबीन करते हैं तो उस समय उसकी छानबीन करने में ये सात प्रकार के विचार सामने आते हैं। इन सात प्रकार के विचारों की उपस्थिति उस समय वस्तुगत धर्म को सात प्रकार से जानने की इच्छा से ही होती है । सात प्रकार की जिज्ञासा का कारण इस प्रकार के ही सात प्रश्नों का होना है। इस प्रकार के सात प्रश्नों के होने का कारण बस्तुगत धर्म में सात प्रकार के संशयों का होना है । इसलिए वस्तुगत प्रत्येक धर्म में सात प्रकार के ये उत्तर रूप भङ्ग होते हैं । अतः इस प्रकार से अनन्त सप्तभङ्गी का सदभाव जब सिद्ध हो जाता है तो इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि बस्तुगत एक-एक धर्म विषयक ७ प्रकार के उद्भत संशय को दूर करने के लिए ये पूर्वोक्त रूप से सात ही भङ्ग होते हैं । सूत्र-सप्तभंगीयं प्रतिभंगं सकलादेश विकलादेश भेदात् द्विविधा ।। २५ ।। संस्कृत टीका-सप्तभंगाः सद्भावं सोपपत्तिकं प्रख्यायाधुना सा प्रमाण सप्तभंगी-नयसप्तभंगी भेदेन द्विविधा भवतीति प्रतिपादयितु “सप्तभंगी प्रतिभंगमित्यादि' सूत्रमाह--- एवं च पूर्वोक्त स्वरूपा सप्तभंगी प्रतिभंग द्विविधा--सकलादेशस्वभावा विकलादेश स्वभावाच । सकलादेशस्वभावा प्रमाणसप्तभंगीत्युच्यते । विकलादेशस्वभावातु नयभंगीत्युच्यते । तथा चैकधर्म बोधनमुखेन कालादिभिरभेदबृत्त्याऽभेदोपचारेणाऽनेकाशेषधर्मात्मकवस्तु विषयक बोधजनकवाक्यत्वं सकलादेशम्', अभेदवृत्त रभेदोपचारस्य वाऽनाश्रयणे एकधर्मात्मक वस्तु विषयक बोधजनक वाक्यत्वरूपं विकलादेशत्वम् । तत्र द्रध्यार्थिकमयानुसारेण सर्वपर्यायाणां द्रव्यात्मकत्वात् स्यादस्त्येव घटः इति वाक्यमस्तित्वस्वरूपैकधर्म प्रतिपादन द्वारा तदात्मक सकलधर्मात्मकस्य वस्तुनोऽभेदवृत्त्या प्रतिपादक भवति, पर्यायाथिकनयानुसारेण तु सर्वपर्यायाणां परस्परभिन्नत्वात् एकस्य शब्दस्यानेकार्थप्रत्यायने सामर्थ्य विरहादभेदोपचारेणानन्तधर्मात्मकस्य वस्तुनः प्रतिपादकं भवति । इतिरोत्था द्रव्याथिकनवेन पर्यायाथिक नयेन वा प्रतिभंग प्रमाण सप्तभंगी प्राधान्येन अतिस्त्वात्मक धर्मबोधकद्वारा अभेदवत्याः अभेदोपचारादा विवक्षितास्तित्वाद्य कवत्मिकानेकाशेषधर्मात्मक वस्तू विषयक वोधजनक वाक्य रूपा 'सती सकलादेशस्वभावा भवति नय सप्तभंगी तु अभेदवृत्त रभेदोयचारस्य वाऽनाश्रयणे प्रधानतया एकधर्मात्मक वस्तु विषयक बोध जनक वाक्य रूरा सती विकलादेशस्वभावा भवतीति भावः ।.. हिन्दी व्याख्या-यह सप्तभगी प्रत्येक भंग में सकलादेशरूप और विकलादेशरूप होती है। इसी कारण इसे इन्हीं दो भेदों में विभक्त किया गया है । प्रमाणवाक्य सकलादेशरूप होता है इसलिये सकलादेश स्वभाव वाली प्रमाण सप्तभंगी होती है। नयवाक्य विकलादेश रूप होता है। इसलिए विकलादेश स्वभाववाली नय सप्तभंगी होती है। वस्तगत अनन्त धर्मों में से किसी एक धर्म के प्रतिपादन द्वारा जो वाक्य उन औष धर्मों की उस प्रतिपादित किये गये धर्म के साथ कालादि द्वारा अभेद वृत्ति मानकर ने उसमें उनके अभेद का उपचार करके उन समस्त धर्मों का प्रतिपादन करता है, उस अनन्त धर्मात्मक वस्तु
SR No.090312
Book TitleNyayaratna Sar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherGhasilalji Maharaj Sahitya Prakashan Samiti Indore
Publication Year
Total Pages298
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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