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________________ १०८ । न्यायरत्न : न्यायरत्नावली टीका : चतुर्थ अध्याय, सूत्र २३ हिन्दी व्याख्या-यदि ऐसा कहा जाय कि एक साथ अस्तित्व नास्तित्व धर्मों का प्रतिपादक कोई शब्द नहीं है, इसलिये इन दोनों धर्मों से विशिष्ट वस्तु सर्वथा अवक्तव्य ही है। तो इस एकान्त मान्यता का निरसन करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि यदि ऐसी ही एकान्त मान्यता को प्रश्रय दिया जावे तो फिर जैसे कोई ऐसा कहे कि "मेरी माता बन्ध्या है" अथवा भोजन करता हुआ कोई व्यक्ति ऐसा कहे कि “मैं भोजन करते समय नहीं बोलता हूँ-मौन से भोजन करता हूं" तो यह सब जैसा वदतोव्याघात है-स्ववचन बावित है- 'समी या कामही इगतोव्याघात है। क्योंकि सर्वथा अवक्तव्यता में "यह अवक्तव्य है" इस प्रकार के शब्द द्वारा भी वह कथित नहीं किया जा सकता है। नहीं तो बह “अबक्तव्य" इस भब्द के द्वारा बक्तब्य हो जाता है और इस तरह से यह इस एकान्त पक्ष पर स्वयं की ओर से कुठाराघात करना है । अतः इस एकान्त मान्यता का परित्याग कर "कथंचित् वस्तु अवक्तव्य है" ऐसा अनेकान्त पक्ष ही अंगीकार करना चाहिये ॥ २२॥ सूत्र–इतरथापि संवेदनाच्छेषभंग त्रयकान्तोऽप्येवमेव ।। २३ ।। संस्कृत टीका-विधिस्पार्थस्य वाचतत्वे सति युगपदुभयार्थस्यावाचक एक शब्द इत्येवं रूपः पञ्चमभंगैकान्तः, निषेधार्थस्य बाचकत्वे सति युगपदुभयार्थस्यावाचक एव शब्द इत्येवं रूपः पठभंगैकान्त पक्षः, क्रमादुभयस्य वाचकः सन्नपि युगपदुभयस्यावाचक एव शब्द इत्येवं रूगः सप्तमभंगकान्तपक्षोऽपि अक्रान्तः । पञ्चमभंगकान्तस्याकान्तत्वं निषेधार्थस्य वाचकत्वेन महापि युगपदुभयार्थस्य अवाचकत्व दर्शनात सिद्ध यति, षष्ठभंगकान्तपक्षस्याकान्तत्वविध्यर्थस्य वाचकत्वेन सहापि यगपदभग्रावाचकत्व दर्शनेन सिध्यति, गप्तमभंगैकान्तपक्षस्या कान्तत्व केवलं विध्यादि प्राधान्येनापि वाचकत्व दर्शनतः सिध्यति इदमेवेतरथापि संवेदना छदेन प्रकाशितम् । किमधिकं प्रोक्तेन सुधियो विचारयन्तु, स्वयमेवैते एक धर्ममाश्रित्य मूलोक्ताः सप्तभंगाश्चन्द्रप्रभावाच्चकासते, कौमुदं च वर्धयन्ति । सूत्रार्थ-शेष भङ्गों का-५वें, ६वें और ७वं भंगों का-एकान्त पक्ष भी इसी तरह का हैअकान्त है-सदोष है। हिन्दी ध्याल्या-पांचवाँ भंग निर्दोष, जैसा कि पहले प्रकट किया जा चुका है, माना गया है। परन्तु जब ऐसा कहा जाता है कि शब्द विधिरूप अर्थ का वाचक होता हुआ एक साथ वह विधि-निषेध का अवाचक ही होता है तब उस भंग में एकान्तता आ जाती है और यह एकात्तता अनेकान्त पक्ष के समक्ष इसलिए प्रमाणित नहीं हो पाती है कि शब्द निषेध रूप पदार्थ का भी वाचक होता हुआ युगपत् विधि-निषेध दोनों रूप पदार्थ का अवाचक होता है । इस तरह केवल एक पञ्चम भंग ही नहीं बनता है। ६बा भंग भी बनता है। इसी प्रकार ऐसा एकान्ततः प्रतिपादन करने वाला "कि शब्द नास्तित्व रूप अर्थ का प्रतिपादन करता हुआ युगपत् विधि-निषेधात्मक पदार्थ का वाचक नहीं ही होता है।" छठवां भंग भी नहीं बनता है। क्योंकि शब्द विधिरूप अर्थ का भी प्रतिपादक होता हुआ विधि-निषेधरूप अर्थ का युगपत् बाचक नहीं होता है। इसी तरह पांचवें भंग के सद्भाव हो जाने से केबल ६खें भंग का ही सद्भाव सिद्ध नहीं होता है । इसी प्रकार सातवें भंग का भी एकान्त कथन अकान्त होता है क्योंकि शब्द प्रथम आदि भंगों का भी वाचक है यही बात ५, ६वें और सातवें भंग की एकान्तता में अकान्तता एकट करने वाली "इतरथाऽपि संवेदनात्" इस पाठ द्वारा पुष्ट की गई है। अब इस सम्बन्ध में अधिक प्रतिपादन करने की
SR No.090312
Book TitleNyayaratna Sar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherGhasilalji Maharaj Sahitya Prakashan Samiti Indore
Publication Year
Total Pages298
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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