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________________ ७२/ न्यायरत्न : न्यायरत्नावली टीका : तृतीय अध्याय, सूत्र ४९-५०-५१-५२ हिन्दी व्याख्या--साध्य विरुद्ध व्याप्योपलब्धि का स्वरूप क्या है ? इस बात को समझाने के लिए ग्रन्थकार कहते हैं- "इस प्राणी में तत्त्वों का निश्चय नहीं है । क्योंकि इसे तत्त्वों में सन्देह है यहाँ प्रतिषेध्य साध्य तत्त्वनिश्चय है. क्योंकि उसी का प्रतिषेध किया गया है। जिसका प्रतिषेध किया जाता है वही प्रतिषेध्य होता है। इस प्रतिषेध्य साध्य से विरुद्ध तत्त्वानिश्चय है। इस अनिश्चय का व्याप्य तत्त्व सन्देह है। और उसी की इस प्राणी में उपलब्धि हो रही है। अतः इससे तत्त्व निश्चयाभाव की वहाँ अनुमिति होती है। तत्त्वानिश्चय को व्यापक इसलिए माना गया है कि यह विपर्यय और अनध्यवसाय में सन्देह के बिना भी रहता है। परन्तु सन्देह तत्त्वानिश्चय के बिना कहीं पर भी नहीं रहता है। इसलिये व्याप्य तत्त्व सन्देह से व्यापक तत्त्वानिश्चय की अनुमिति हो जाती है ।। ४ ।। सूत्र-तृतीया--अस्मिन्नास्ति क्रोधोपशमो वदनविकारोपलम्भादिति ।। ४६ ।। संस्कृत टोका-अत्र प्रतिषेध्यः क्रोधोपशमस्तेन सह साक्षाद्विरुद्धः क्रोधः तस्य कार्य बदनविकारस्तस्योपलब्धिर्वर्तते । तया क्रोधोपणमाभावस्यानुमिति भवति ।। हिन्दी व्याख्या-यह तीसरी साध्य विरुद्ध कार्योपलब्धि का उदाहरण है-यहाँ प्रतिषेध्य क्रोधोपशम है । इसके साथ साक्षाद्विरुद्ध क्रोध है। इसका कार्य बदनविकार है। इसकी उपलब्धि विवक्षित प्राणी में हो रही है। इससे क्रोधोपणम का अभाव अनुमित हो जाता है ।। ४६ ।। सूत्र-चतुर्थी-अस्यमुनेरसत्यवचोनास्ति राग-द्वेष कालुष्याषित ज्ञानवस्वादिति ।। ५० ।। संस्कृत टीका-अत्र प्रतिषेध्यम् असत्यं वचः तेन सह साक्षाद्विरुन सत्यं वचः तस्य कारणं रागद्वष कालुष्यादुषित ज्ञानम् । तत् स्वसद्भावतः तत्र असत्यं प्रतिषेधति । हिन्दी व्याख्या-चौथी साध्य विरुद्ध कारणोपलब्धि है। इसका यह उदाहरण है-इस मुनि के वचन असत्य नहीं हैं। क्योंकि यह रागद्वेष कालुष्य आदि से अदुषित ज्ञान से युक्त है। यहाँ प्रतिषेध्य असत्य वचन है। उसके साथ साक्षाद् विरुद्ध सत्य वचन है। उसका कारण राग-द्वेष कालुप्य से अदूषित ज्ञान है । ऐसे ज्ञान से युक्त यह मुनि है । अतः इससे उसमें असत्य बचन के अभाव का अनुमान हो जाता है ॥ ५० ॥ सूत्र-पञ्चमी-नोद्गमिष्यति मुहूर्तान्ते शकटरेवत्युद्गमोपलम्भाविति ॥ ५१ ॥ संस्कृत टीका-अत्र प्रतिषेध्यः प्राकटोदय रोहिण्युदयस्तेने विरुद्धोऽश्विन्युदयस्तत्पूर्वचगे रेवत्युदयस्तत्सद्भाबोपलम्भात् शकटोदया भावस्यानुमितिर्भवति । हिन्दी व्याख्या-पांचवीं विरुद्ध पूर्वचरोपलब्धि है। उसी का इस दृष्टान्त द्वारा स्पष्टीकरण किया गया है। एक मुहूर्त के बाद शकट रोहिणी का उदय नहीं होगा। क्योंकि अभी रेवती का उदय हो रहा है। यहां पर प्रतिषेध्य शकटोदय है। इसके विरुद्ध अश्विनी का उदय है और इसका पूर्वघर रेवती का उदय है। उसकी इस समय उपलब्धि हो रही है। इससे एक मुहूर्त के बाद शकटोदय के अभाष की अनुमति हो जाती है ।। ५१ ॥ सूत्र-षष्ठी-नोगान् मुहूर्तात् पूर्व रोहिणी उतरफल्गुन्युक्याविति ।। ५२ ॥ संस्कृत टीका-अत्र प्रतिषेध्यो रोहिण्युदयस्तेन सह साक्षाद्विरुद्धस्योत्तरचरस्योत्तरफल्गुन्युदयस्य हेतोरुपलब्धिः (षष्ठी) साध्य विरुद्धोत्तरचरोपलब्धिः ।
SR No.090312
Book TitleNyayaratna Sar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherGhasilalji Maharaj Sahitya Prakashan Samiti Indore
Publication Year
Total Pages298
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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