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________________ न्यायरश्म: ग्यायरत्नावली टीका तृतीय अध्याय, सूत्र ४७-४८ | ७१ द्विरुद्ध पूर्ववररूप हेतोरुपलब्धिः साध्यविरुद्धोत्तरचरोपलब्धिः प्रतिषेध्येन साध्येन सह साक्षाद्विरुद्ध सहचर रूप हेतोरपलब्धिः साध्यविरुद्ध सहचरोपलब्धिः एतासां सप्तानामपि साध्यविरुद्धोपलब्धीनामुदाहरणानि यथाक्रममग्रे वक्ष्यन्ते ।। ४६ ।। सूत्रार्थ-साध्य से विरुद्ध की जो उपलब्धि है वह साध्य के प्रतिषेध की अनुमिति में विरुद्ध स्वभाबोपलब्धि, विरुद्ध व्याप्योपलब्धि आदि के भेद से सात प्रकार की है । हिन्दी व्याख्या - छ: प्रकार की साध्याविरुद्धोपलब्धि के भेदों का प्रतिपादन करके अब उपलब्धि के द्वितीय भेद रूप जो साध्य विरुद्धोपलब्धि है । उसका ग्रन्थकार कथन करते हैं- इससे साध्य से विरुद्ध हेतु की जो उपलब्धि है । यही साध्य विरुद्धोपलब्धि है। यह साध्य के प्रतिषेध का साधक होती है । इसके साध्य विरुद्ध स्वभावोपलब्धि, साध्य विरुद्ध व्याप्योपलब्धि, साध्य विरुद्ध कार्योपलब्धि, माध्य विरुद्ध कारणोपलब्धि, साध्यनिरुद्ध पूर्वच रोपलब्धि, साध्यविरुद्धोत्तरवरोपलब्धि और साध्य विरुद्ध सहचरोपलब्धि ऐसे सात भेद हैं इनमें प्रतिषेध्य साध्य के स्वरूप के साथ जो हेतु साक्षात् विरुद्ध हो ऐसे हेतु की जो उपलब्धि है, वह साध्य विरुद्ध स्वभावोपलब्धि है, इसी प्रकार से प्रतिषेध्य साध्य के साथ जो साक्षात् विरुद्ध है उस विरुद्ध पदार्थ के व्याप्य रूप हेतु की जो उपलब्धि है । वह साध्य विरुद्ध व्याप्योपलब्धि है। प्रतिषेध्य साध्य के साथ साक्षाद विरुद्ध के कारण रूप हेतु की जो उपलब्धि है, वह साध्यनिरुद्ध कारणोपलब्धि है । प्रतिपेय साध्य के साथ साधार के पूर्व रूप हेतु की जो उपलब्धि है, वह साध्य frana पूर्वरोपलब्धि है। प्रतिषेध्य साध्य के साथ साक्षात् विरुद्ध के उत्तरन्तर रूप हेतु को जो उपलब्धि है वह साध्यविरुद्ध उत्तरचरोपलब्धि है। तथा प्रतिषेध्य साध्य के साथ साक्षात् विरुद्ध के सहचर रूप हेतु की जो उपलब्धि है । वह साध्य विरुद्ध सहचरोपलब्धि है। इन सातों को स्पष्ट रूप से समझने के लिये उदाहरणों को अब दिखाया जाता है ।। ४६ ।। सूत्र - आद्या सर्व काम्तपक्षो न संभवति अनेकान्तपक्षोपलम्भादिति ॥ ४७ ॥ संस्कृत टीका- आद्य पदेनात्र साध्य स्वभाव विरुद्धोपलब्धिह्यते । तथा च सर्वथैकान्तपक्षोऽत्र प्रतिषेध्यः अस्य स्वभावेन सहसाक्षाद्विरुद्धस्य अनेकान्तपक्षस्योपलम्भात् सर्वथैकान्त पक्षाभावस्यानुमिति भवति । हिन्दी व्याख्या-साध्य से विरुद्धभूत हेतु की जहाँ उपलब्धि होती है। वह हेतूपलब्धि साध्य की प्रतिषेध साधिका होती है। इसके सात भेद जो ऊपर में प्रकट किये हैं । उनमें से जो प्रथम साध्य विरुद्ध स्वभावोपलब्धि है । उसका स्वरूप उदाहरण द्वारा यहाँ प्रकट किया गया है। इसमें यह समझाया गया है कि यहां पर प्रतिषेध्य साध्य सर्वथा एकान्त पक्ष है क्योंकि उसी का निषेध किया जा रहा है। उसका जो स्वभाव-स्वरूप है उस स्वभाव स्वरूप के साथ अनेकान्त का विरोध है, और उसी की वस्तु में उपfb हो रही है अतः वस्तु सर्वथा एकान्त पक्ष से रहित है, ऐसी अनुमिति होती है ।। ४७ ।। सूत्र - द्वितीया-अस्मि स्तव निश्चयो नास्ति तत्त्व सन्देहादितिः ॥ ४७ ॥ संस्कृत टीका - "अत्र विवक्षित प्राणिनि-तत्त्वनिश्चयो नास्ति । तत्व सन्देहात् " अमुना प्रकारेण प्रतिपादने तत्त्व निश्चयश्चात्र प्रतिषेध्य तस्यैव प्रतिषेधात् । तेन सह साक्षाद्विरुद्धस्तत्त्वानिश्वयम्तेनसह व्याप्यभूतस्य तत्त्व सन्देहस्योपलब्ध्या तत्त्वनिश्चयाभावस्यानुमितिर्भवति ।
SR No.090312
Book TitleNyayaratna Sar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherGhasilalji Maharaj Sahitya Prakashan Samiti Indore
Publication Year
Total Pages298
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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