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________________ ६६ । न्यामरत्न : न्यायरत्नावली टीका : तृतीय अध्याय, सूत्र ३६ विरुद्धानुपलब्धिः विरुद्ध कार्य-कारण-स्वभाव-व्यापक-सहचरानुपलब्धिभेदात् पञ्चविधा भवति । एतासां सर्वासामुदाहरणानि यथास्थानमग्रे स्वयं सत्रकार प्रतिपादयिष्यति ।। ३६॥ हिन्दी व्याख्या हेतु दो प्रकार का कहा गया है । एक उपलब्धिरूप हेतु और दूसरा अनुपलब्धि रूपहेतु। इनसे उपलब्धि रूप हेतू अपने साध्य की सत्ता का ही साधक होता है और अनुपब्धि रूप हेतु । सत्ता का साधक नहीं होता है अपात उसके प्रतिषेत्र काही साधक होता है। ऐसी जो एकान्तवादियों की मान्यता है। उस मान्यता को ही इस सूत्र द्वारा सूत्रकार ने हटाया है और अनेकान्त रूप मान्यता का मण्डन किया है । इसके द्वारा यह समझाया गया है कि हेतु का अन्यथानुपपत्ति यही एक निर्दोष लक्षण है। इस लक्षण वाला हेतु विधिरूप और प्रतिषेध रूप होता है जैसे “पर्वतोऽयं वह्निमान् धुमात्" यहाँ धूमरूप हेतु विधिरूप है, क्योंकि वह अग्निरूप साध्य के अस्तित्व को सिद्ध करता है। "नास्त्यत्र प्राणिनि मिथ्यात्व आस्तिक्योपलब्धेः" इस प्राणी में मिथ्यात्व नहीं है, क्योंकि इसमें आस्तिक भाव की उपलब्धि हो रही है। यहाँ पर हेतु प्रतिषेध रूप है क्योंकि यद् मिथ्यात्व का प्रतिषेध सिद्ध करता है । इतना चित्त में अवधारण करके इस मूत्र को समझना चाहिये। विधिरूप हेतु का नाम ही उपलब्धिरूप हेतु है। यह उपलब्धि अविरुद्धोपलब्धि और विरुद्धोपलब्धि के भेद से दो प्रकार की होती है। साध्य के साथ जो हेतु विरुद्ध नहीं होता है वह अविरुद्धोक्लब्धि रूप हेतु होता है। ऐसा हेतु अपने साध्य के अस्तित्व का साधक होता है और जो हेतु अपने साध्य से विरुद्ध होता है। वह उसका साधक नहीं होता है किन्तु उसका प्रतिषेधक होता है। ऐसा हेतु विरुद्धोपलब्धि रूप होता है। इस प्रकार के कथन से यह हम भली-भांति समझ जाते हैं, कि उपलब्धिरूप होता हुआ भी हेतु विधि और प्रतिषेध इन दोनों का साधक होता है । इसी प्रकार से अनुपलब्धिरूप जो हेतु होता है वह भी अपने साध्य के अस्तित्व और नास्तित्व दोनों का साधक होता है। यदि वह साध्य से अविरुद्धानुपलब्धि रूप है, तो वह उसके नास्तित्व का और यदि वह विरुद्धानुपलब्धि है तो वह उसके अस्तित्व का साधक होता है। साध्य के अस्तित्व का साधक जो अविरुद्धोपलस्विरूप हेतु है वह छह प्रकार का होता है--- साध्याविरुद्ध व्याप्योपलब्धिरूप हेतु (१) साध्याविरुद्ध कार्योपलब्धि रूप हेतु (२) साध्याविरुद्ध कारणोपलब्धि रूप हेतु (३) साध्याविरुद्ध पूर्वचरोपलब्धि रूप हेतु (४) साभ्याविरुद्ध उत्तरचरोपलब्धि रूप हेतु (५) और साध्याविरुद्ध सहचरोपलब्धि रूप हेतु (६)। साध्य के नास्तित्व का साधक जो विरुद्धोपलब्धिरूप हेतु है वह सात प्रकार का है--स्वभाव विरुद्धोपलब्धि रूप हेतु (१) विरुद्ध कार्योपलब्धि रूप हेतु (२) विरुद्धच्याप्योपलब्धिरूप हेतु (३) विद्धकारणोपलब्धिरूप हेतु (४) विरुद्ध पूर्वचरोपलब्धिरूप हेतु (५) विरुद्ध उत्तरचरोपलब्धिरूप हेतु (६) और विरुद्ध सहचरोपलब्धिरूप हेतु (७)। साध्य के नास्तित्व का साधक जो अविरुद्धानुपलब्धिरूप हेतु है वह ७ सात प्रकार का है और विरुद्धानुपलब्धिरूप जो हेतु है बह ५ पाँच प्रकार का है । वे ७ प्रकार ये हैं-अविरुद्ध स्वभावानुपलब्धि (१) अविरद्ध व्यापकानुपलब्धि (२) अविरुद्ध कार्यानुपलब्धि (३) अविरुद्ध कारणानुपलब्धि (४) अविरुद्ध पूर्वच रानुपलन्धि (५) अविरुद्ध उत्तरचरानुपलन्धि (६) और अविरुद्ध सहचरानुपलब्धि (७)। विरुद्धानुपलब्धि के ५ पाँच भेद हैं-विरुद्ध कार्यानुपलब्धि (१) विरुद्ध कारणानुपलब्धि (२) विरुद्ध स्वभावानुपलब्धि (३) विरुद्ध व्यापकानुपलब्धि (४) और विरुद्ध सहचरानुपलब्धि (५) । इनका स्पष्टीकरण सूत्रकार आगे करने वाले हैं-अतः वहीं से इन सब का बोध सुगम रीति से
SR No.090312
Book TitleNyayaratna Sar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherGhasilalji Maharaj Sahitya Prakashan Samiti Indore
Publication Year
Total Pages298
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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