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________________ न्यायरत्न : न्यायरत्नावली टीका : द्वितीय अध्याय, सूत्र १४ 1 ३३ प्रश्न-जैसा क्रम इनकी उत्पत्ति का आपने प्रकट किया है यदि इनकी उत्पत्ति का वह क्रम न माना जावे नो क्या हानि है ? हमें ऐसा अनुभव में तो नहीं आता है कि पहले दर्शन हुआ, उसके बाद अवग्रह हुआ, फिर ईहा ज्ञान हुआ, फिर अवाय हुआ और फिर धारणा हुई। क्योंकि पदार्थ को देखते ही उसका स्पष्ट बोध हो जाता है। उत्तर—यह पहले प्रकट किया जा चुका है कि जो विषय अभ्यस्त होता है उसके जानने में इनका उत्पाद ऋम अनुभव में नहीं आता है, जिस प्रकार सालिक साड़ने पर उसके डोरों के फटने का क्रम अनुभव में नहीं आता है, क्योंकि हमारा ज्ञान क्षायोपशमिक ज्ञान है और उसमें इतनो सूक्ष्म बात को जानने की शक्ति नहीं है। परन्तु यह तो मानना ही चाहिए कि शाटिका के सभी डोरे एक साय नहीं फटे हैं, एक के बाद एक रूप में ही फटे हैं । इसी प्रकार अभ्यस्त विषय में इनका उत्पाद इतनी शीघ्रता से होता है, कि वह हमें अनुभव में नहीं आता है । अनुभव में नहीं आने से किसी भी सद्भावरूप वस्तु का अपलाप तो किया नहीं जा सकता है, नहीं तो फिर सूक्ष्मादि पदार्थों के भी अपलाप करने का प्रसंग प्राप्त होगा।हा जो विषय अनभ्यस्त हैं उनमें इनकी उत्पत्ति का काल ऋम तो अनुभव में आता ही है। तभी तो ज्ञान में प्रमाणता की ज्ञप्ति अनभ्यस्त विषय में परतः कही गई है । अतः यह स्वीकार करना चाहिए कि जब तक पदार्थ का सन्तावलोकनरूप दर्शन नहीं होता है तब तक अवग्रह का जन्म नहीं हो सकता है, और अवग्रह के जन्म के अभाव में संशय की उत्पत्ति न हो सकने से गवेषणा-मार्गणा करने रूप ईहा का प्रादुर्भाव नहीं हो सकता है। और जब ईहा का ही उत्पादन होगा तब फिर निश्चयात्मक अवाय की उत्पत्ति का भी अभाव हो जायगा, और स्मृति की कारणभूत धारणा के अभाव में विषय व्यवस्था न हो सकने के कारण सांसारिक समस्त व्यवहार का उच्छेद हो जायगा। अतः इन समस्त दोषों की आपत्ति से सांसारिक व्यवहार व्याकुलित न बन जाये इसके लिए इनकी उत्पत्ति का क्रम जैसा कहा गया है वैसा ही मानना चाहिए ||१३|| सूत्र-द्विविधमतीन्द्रियज्ञानं पारमार्थिक प्रत्यक्षम् ॥१४॥ संस्कृत टीका-यज्ज्ञानमिन्द्रियादि निमित्त न भवति केवलमात्मनिमित्त भवति तदेव ज्ञानमतीन्द्रिय कथ्यते, इदमेव पारमार्थिक प्रत्यक्ष-मुख्यं प्रत्यक्षमित्यादि शब्दैर्व्यवल्लियते-तथा च जीवद्रव्य मात्रमाधिस्य जायमानं ज्ञानं पारमाणिक प्रत्यक्षमिति, सकलविकलभेदात्तद्विविधम् तत्र कतिपय विषयं विकल तदपि द्विविधम् अवधिज्ञानं मनःपर्ययज्ञानं चेति । तत्र वीर्यान्तराय क्षयोपशम सहकृतादवधिज्ञानावरण क्षयोपशमाज्जातं रूपिद्रव्य विषयं मवगुणप्रत्ययमवधिज्ञानम् । वीर्वान्त राय क्षयोपशम सहकृतात्मनःपर्यय ज्ञानावरण क्षयोपशमाज्जातं मनोद्रव्यपर्यायविषयकं मनःपर्ययज्ञानम् । निखिलावरणविमुक्तं सर्वद्रव्य पर्याय विषयक केवलज्ञानं सकलप्रत्यक्षम् । सकलताविकलता चात्र विषयकृता । नतु वैशद्यकृता, स्वस्वविषयेऽशेषतः सर्वेषां नर्मल्यात् । हिन्दी व्याख्या-जो ज्ञान इन्द्रिय एवं मन की सहायता से नहीं होता है, किन्तु केवल प्रात्मा की सहायता से ही होता है, वहीं पारमार्थिक प्रत्यक्ष है । यह पारमार्थिक प्रत्यक्ष सकलप्रत्यक्ष और विकलप्रत्यक्ष के भेद से दो प्रकार का कहा गया है । इसी पारमार्थिक प्रत्यक्ष का कहीं-कहीं मुख्यप्रत्यक्ष ऐसा दूसरा नाम भी व्यवहत हुआ है । जो ज्ञान द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की मर्यादा लेकर केवल रूपी द्रव्य को ही स्पष्ट रूप से जानता है. वह विकलप्रत्यक्ष है। अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान ये दो विकलप्रत्यक्ष हैं। वीर्यान्तराय के क्षयोपशम महकृत अवधिज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से उत्पन्न न्या. दी ५ .
SR No.090312
Book TitleNyayaratna Sar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherGhasilalji Maharaj Sahitya Prakashan Samiti Indore
Publication Year
Total Pages298
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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