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________________ न्यायरत्न : न्यायरलावली टीका : द्वितीय अध्याय, सूत्र १३ हिन्वी श्याख्या—जिसका स्वरूप प्रकट कर दिया गया है, ऐसा अवायरूपज्ञान हो जब दृढ़तर अवस्था वाला हो जाता है, तब वह मात्मा में एक ऐसा संस्कार उत्पन्न कर देता है कि जिसकी वजह से आत्मा पूर्वदृष्ट' पदार्थ का कालान्तर में भी स्मरण करता है । स्मरण का आकार "वह" ऐसा कहा गया है । यही बात अन्यत्र भी कही गई है। इन ज्ञानों का उत्पत्ति-क्रम ऐसा ही है । पहले दर्णन होता है, फिर अवग्रहरूप ज्ञान होता है, अवग्रह से जाने गये पदार्थ में उत्पन्न हुए संशय को दूर करने के लिए, ईहा ज्ञान उत्पन्न होता है, ईहा के विषयभूत पदार्थ को निश्चय करने वाला अवायज्ञान होता है। और अबाय द्वारा जाने गये पदार्थ का कालान्तर में स्मरण होता रहे, इसके लिए धारणा ज्ञान होता है । अभ्यस्त विषय में--- परिचित स्थान आदि में-जो इस प्रकार से इसका उत्पत्ति-क्रम जानने में नहीं आना है, उमका कारण इनका वहाँ पर शीघ्रता से उत्पाद हो जाना ही है। इस तरह से अवग्रहादि ज्ञान एक ही वस्तु में होते हैं । ऐसा नहीं है कि किसी वस्तु का अवग्रहरूप ज्ञान हो और किसी का ईहादि रूप ज्ञान हो । चेतनरूप आत्मा का ही यह योग्यता के बश से उत्तरोत्तर में अवग्रहादि रूप उपयोगविशेष होता है। दर्शन का उत्तरपरिणाम अवग्रह, इसका उत्तरपरिणाम ईहा, ईहा का उत्तरपरिणाम अवाय, और अवाय काही उत्तरपरिणाम धारणा है । इस तरह से विचार करने पर अपि इनमें कथंचिद् अभिन्नता आती है, परन्तु फिर भी इनमें संज्ञा भेद से ही भिन्नता है, ऐसा मानना चाहिए ॥१२॥ सूत्र-क्रमिकाविभूतदर्शनावरणावि कर्मक्षयोपशमजन्यत्वेनैषामुक्त क्रमवत्वं नोबेद्विषय व्यवस्थाऽभावः ।।१३।। ___ संस्कृत टीका--- "दर्शनावग्रहादिक्तक्रमवत्वं कथं जायते" इत्यादिरेका निवृत्त्यर्थ मिदं प्रणीतं मूत्रकृता । तथा च दर्शनावग्रहादिषु पुर्वोक्त अमवत्त्वं क्रमिकाविर्भूत दर्शनावरणादि कर्मक्षयोपशम जन्यत्वात् । विषय-विषयि-सम्बन्धानन्तरं यदेव बस्तु दर्शनेन सत्वसामान्यरूपतया ज्ञायते तदनन्तरं तदेव अवग्नहेण मनुष्यत्वादि रूपावन्तर सत्ताविशिष्ट ज्ञायते, तदनन्नरं जायमानेन संशयेनानिश्चितरूपतया संदिह्यते, ततो निश्चयाभिमुखी प्रवृत्तिरूपया ईह्या ईह्यते । ततो निश्चयाकारणावायेनावयते पश्चात् कालान्तरे अविस्मृतिरूपतया धारणया धार्यते । एवंविधो योउनुभूयते क्रम एतेषु, स कारण क्रमपूर्वक एव, कार्यक्रमस्य कारण क्रमपूर्वकत्व दर्शनात्, कारणऋमश्च दर्शनावरणाद्यावरण क्षयोपशमरूपोऽत्र, अतो येन क्रमेण दर्शनाबरणाद्याबरण क्षयोपशमः संभवति तेनैव क्रमेण एते दर्शनावग्रहादय उत्पद्यन्ते, अतोऽत्र क्रमबत्त्वं नासिद्धम्, एवमेवैतेषु परम्पर भिन्नत्वमपि असाकल्पनापि उत्पद्यमानत्वात्, विषयसाडूर्यमपि नास्ति अपूर्वापूर्व स्व-स्वविषय ग्राहकत्वात् । क्रमालापे विषय व्यवस्थाभावप्रसङ्गः स्यात् ।। सुमार्थ अपने-अपने आवारक कर्मों का भयोपशम क्रमशः होता है, और उसी क्षयोपशम के क्रमानुसार इन दर्शनादिकों की उत्पत्ति होती है । इसलिए इनमें ऋमिकता सिद्ध मानी गई है। हिन्दी व्याख्या-यह बात सङ्केत रूप से ऊपर प्रकट कर दी गई है कि इन दर्शन अवग्रहादिरूप ज्ञानों की उत्पत्ति क्रमशः होती है। अब सूत्रधार इसी क्रम का युक्तिपुरस्सर विचार कर रहे हैंइसमें उन्होंने यह समझाया है, कि दर्णन, अवग्रह, संशय, ईहा, अवाय और धारणा इस क्रम से जो ये उत्पन्न होते है मो इस क्रमिक उत्पत्ति का कारण अपने अपने आवारक कर्मों का क्षयोपशम क्रम है। विषय १. इसके लिए देखो-न्यायकुमुदचन्द्र पृ० १७३ तथा प्रमाण भीमामा पृ० २२
SR No.090312
Book TitleNyayaratna Sar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherGhasilalji Maharaj Sahitya Prakashan Samiti Indore
Publication Year
Total Pages298
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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