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________________ न्यामरत्न : त्यायरत्नावली टीका : प्रथम अध्याय, सूत्र ३ अनुमान के पांच अङ्ग होते हैं-प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपन्य और निगमन । "शानं प्रमाणम्' यह धर्म धर्मी का समुदायल्प बाक्य प्रतिज्ञा है। एवम्-"इष्टानिष्ट वस्तूपादानहानक्षमत्वात्" यह हेतु है । यहाँ अन्वय दृष्टान्त नहीं है, पर घटपटादिरूप व्यतिरेक दृष्टान्त है । अन्वय दृष्टान्त और व्यतिरक दृष्टान्त के भेद से इष्टान्त दो प्रकार का कहा गया है । साधन के सदभाव में माध्य का सद्भाव जहां पर पर प्रकट किया जाता है, वह अन्वय दृष्टान्त है। और साध्य के अभाव में साधन का अभाव जहाँ दिखलाया जाता है, वह व्यतिरेक दृष्टान्त है। जैसे रसोईघर की तरह यह पर्वत अग्निवाला है । धूमवाला होने से यहाँ साधन धूम के सद्भाव से ही साध्य--अग्नि का सद्भाव प्रकट करने में रसोईघर अन्वय दृष्टान्त है, तथा जहाँ अग्नि का अभाव है. वहां साधनभूत धूम का भी अभाव है-जैसे तालाब वह व्यतिरेक दृष्टान्त है । क्योकि तालाब में साध्याभाव से साधनाभाव प्रकट किया गया है। पक्ष में हेतु के पुनः कथन करने को--दुहराने को-उपनय कहते हैं, जैसे रसोईघर की तरह यह पर्वत भी धूमवाला है । यहाँ अग्निरूप साध्य को प्रकट करने के लिये एक बार "धूमात्" इस हेतु का प्रयोग किया गया है, और अन्बय दृष्टान्त के कथन के बाद पुनः यह धूमवाला है, ऐसा कहा गया है, अतः धूमरूप हेतु को पक्ष में इस प्रकार से दुहराने वाला बास्य उपनय माना गया है । अब यह पर्वत धूमवाना है, तो अग्निवाला है । इस प्रकार से पक्ष में साध्य के दुहराने को निगमन कहते हैं। प्रकृति में यह सूत्र भी पञ्च अवयवों से युक्त अनुमान प्रमाण स्वरूप है । प्रतिज्ञा, हेतु और उदाहरण यहाँ इस सूत्र में--प्रकट कर दिये गये हैं, इसलिये ज्ञान ही इष्टानिष्ट वस्तु के उपादान और हान में समर्थ है, यह उपनय बाक्य है अतः वही प्रमाण है, यह निगमन वाक्य है। इस प्रकार से इस सूत्र में पञ्चरूपता समझ लेनी चाहिये ॥२॥ सन्निकर्षादि में प्रमाणता का निरसन : सूत्र-स्वार्थनिर्णये साधकतमत्व विरहाघटादेरिव जङस्य प्रामाभ्यामावः ।। ३ ।। संस्कृत टोका-जाइस्य संयोग सन्निकर्षादेः प्रामाण्याभावं समर्थयितुं स्वार्थनिर्णये साधकतमत्व बिरहादित्यादि सूत्रं प्रतिपादयति--स्वावभासनाशक्तस्य परावभासकरवायोगाद् जडस्य सत्रिकर्षादः प्रामाण्यं नोपपद्यते यथा घटादिर्जडतया स्वस्थ पदार्थस्य च गृहादेनिश्चायको न भवति एवमेव जडतया सन्निकर्षादिरपि स्वप्रकाशकत्वाभावेन अचेतनत्वेन च स्वार्थयो निर्णायको न भवति । स्वार्थनिर्णये करणस्यक ज्ञानस्य प्रामाण्य मन्तव्यम्, अनुमानाकारश्चार्य सन्निकर्षादिनप्रमाणं स्वार्थनिर्णयेऽसाधकतमत्वात् । यत। स्वार्थनिर्णयेऽसाधकतमं तन्नप्रमाणं यथा घटादिः, स्वार्थनिर्णयेऽसाधकतमश्च सन्निकर्षादिस्तस्मात् न प्रमाणमिति ॥३॥ हिन्दी व्याख्या-जर में प्रमाणता इसलिये नहीं मानी गई है, कि वह स्वनिर्णय करने में और पर के निर्णय करने में साधकतम नहीं होता है। इसलिये जड़रूप सन्निकर्षादिकों में घटादि की तरह प्रमाणता नहीं आ सकती है। ऐसा नियम है कि जो अपने आपको नहीं जानता या प्रकाशित करता है वह पर पदार्थ को कैसे जान सकता या प्रकाशित कर सकता है । सन्निकर्ष-इन्द्रिय और पदार्थ का सम्बन्ध-चुकि जरूप है, अतः घटपटादि जड़ पदार्थ की तरह वह न अपना निश्चायक होता है. और न पर पदार्थ का निश्वायक
SR No.090312
Book TitleNyayaratna Sar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherGhasilalji Maharaj Sahitya Prakashan Samiti Indore
Publication Year
Total Pages298
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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