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________________ नियमसार-प्राभृतम् ५३७ तदियचदुपंचमेसु कालेसु परमधम्मणासयरा। विपिहोतिला तो पाविट्ठा ॥१६२१॥ चांडाल सबरपाणप्पुलिवणाहलचिलायपहविकुला। दुस्समकाले कषकी उयकपको होति बाबाला ॥१६२२॥ एतदमिथ्यात्ववशीकृता एव जना जिनदेवजिनमुद्राधारिगुरु जिनमतविद्वेषिणो भवन्ति । भगवद्वृषभदेवे विद्यमाने सत्यपि तेषां पौत्रमरीचिकुमारेण परिवाजकेन त्रिषष्ट्युत्तर त्रिशतकुमतं प्ररूपितम् । भगवद्वीरनाथकालेऽपि बुद्धमहात्मना क्षणिक मतं प्रसिद्धं कृतम् । तथापि चतुर्थकाले भगवन्महावीरस्वामिनि मोक्षगतेऽद्य पंचमकाले श्रीगौतमस्वामि प्रभृत्याचारांगज्ञानिनो यावत् कालं यशोत्युत्तषशतवर्षाणि । ततः प्रभृति पंचमकालस्यान्तपर्यन्तं जैनमतमविच्छिन्नप्रवाहेण वत्स्यते । चतुर्विधसंघोऽपि तायत्कालं स्थास्यति । लगती है और विकलत्रय जीवों की उत्पत्ति होने लगती है। तुतोय, 'चतुर्थ व पंचमकाल में उत्तम धर्म को नष्ट करने वाले विविध प्रकार के दुष्ट, पापिष्ठ, कुदेव और कुलिंगी भी दिखने लगते हैं। तथा चांडाल, शबर, श्वपच, पुलिंद लाहल और किरात इत्यादि जातियां भी उत्पन्न हो जाती हैं । तथा दुषमकाल में कल्की व उपकल्की व्यालीस होते हैं। इस द्रव्य मिथ्यात्व के वशीभूत हुये मनुष्य ही जिनदेव, जिनमुद्राधारी गुरु और जिनमत के विद्वेषो होते हैं। भगवान् वृषभदेव के विद्यमान रहते हुये भी उन्हीं के पोते मरीचिकुमार ने परिव्राजक होकर तीन सौ प्रेसठ मिथ्यामतों का प्ररूपण किया था। भगवान महावीर स्वामी के समय में भी महात्मा बुद्ध ने क्षणिक मत को प्रसिद्ध किया है। फिर भी चतुर्थ काल में भगवान महावीर स्वामी के मोक्ष जाने के बाद इस पंचम काल में श्री गौतम स्वामो से लेकर आचारांग ज्ञान की धारी मुनियों के होने तक छह सौ तिरासी वर्ष हुये। उसके बाद से लेकर पंचमकाल के अंतपर्यंत यह जैनमत अविच्छिन्न प्रवाहरूप से रहेगा । मुनि, आर्यिका और श्रावक श्राविका रूप चतुर्विध संघ भी तब तक रहेगा । ६८
SR No.090307
Book TitleNiyamsara Prabhrut
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorGyanmati Mataji
PublisherDigambar Jain Trilok Shodh Sansthan
Publication Year1985
Total Pages609
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size14 MB
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