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________________ लियम्सार- प्राभतम् ५१३ " निर्वाणं तादृशं लोकाग्रं प्राप्नोति सिद्धपरमात्मा सर्वत्र एवमेव सम्बन्ध कर्तव्यः । पुमः किं ? परमं कम्मटु वज्जियं सुद्धं परमं सर्वोत्कृष्टं कर्माष्टकविनिर्मुक्तं शुद्धं निर्वाण यत्र तल्लोकाग्रं प्राप्नोति । ततः किं ? णाणाइचउसहावं अक्खयमविणा समच्छेयं-ज्ञानदर्शन सुखवीर्याश्चत्वारः स्वभावगुणाः यत्र तत् कल्पान्तकालेऽपि क्षयरहितमक्षयं विनाशरहितमविनाशं छेतुमयोग्यम् अच्छे सत् निर्वाणं लोकाग्रं प्राप्नोति । पुनः किंभूतम् ? अब्याबाहमण दियमणोवमं - सर्वबाधाविरहितमव्याबाधम् इंद्रियातीतमनिन्द्रियम्, उपमारहितमनुपमम् । पुनश्च कथंभूतम् ? पुण्णपावणिम्मुक्कं - साताविशुभप्रकृतिबंधोदयैश्च निर्मुक्तं यत्र तल्लोकाग्रं निर्वाणस्थानम् । पुनरपि कीदृशम् ? पुनरागमण विरहिये - पुनः तत्रत्यात् आगमनरहितं पुनरागमनविरहितम् । पुनश्च कीदृशम् ? णिच्चं अचलं अणालंबं - नित्यमनन्तानन्तकालावस्थायिरूपं चलाचलाभावावचलं परद्रव्याचालंबनशून्यं वातवलयाच्चालम्बन रहितमप्येतादृशं निर्वाणं यत्र तल्लोकाग्रं प्राप्नोति । तद्यथा - अनन्तचतुष्टयान्तरं गलक्ष्म्याः समवसरणादिदेवागमनन भोयानचाम राबिविभूतिस्वरूपबहिरङ्गलक्ष्म्याश्च स्वामिनोऽर्हन्तो भगवन्तः सकलपरमात्मानो सिद्धात्मा प्राप्त कर लेते हैं । ऐसा ही सम्बन्ध इन दोनों गाथाओं के अर्थ में सर्वत्र कर लेना चाहिये । पुनः वह निर्वाण कैसा है ? परम-सर्वोत्कृष्ट है, आठों कर्मों से रहित है, शुद्ध है, ऐसा निर्वाण जहाँ है उस लोकाग्र को ये प्राप्त कर लेते हैं । पुनः ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य ये चार स्वभावगुण वहाँ हैं, कल्पांत काल में भी क्षय से रहित वह अक्षय स्थान है, अविनाशी है, छेदन के योग्य न हो सकने से अच्छे है। सर्वबाधा से रहित अव्याबाध है, इन्द्रियों से रहित अतीन्द्रिय है, उपमा से रहित होने से अनुपम है, वह निर्वाण साता आदि शुभ प्रकृतियों के बंध - उदय से रहित है और असाता आदि पाप प्रकृतियों के बंध- उदय से रहित है । वहाँ पहुंच जाने के बाद किन्हीं का भी पुनः वहाँ से आगमन नहीं होता है, अतः पुनरागमन से रहित है । अनंत अनंत काल तक अवस्थायी रूप होने से नित्य है । चलाचल के अभाव से अचल है । परद्रव्य के वातवलय आदि के भी आलंबन से रहित होने से अनालम्ब है । जहाँ ऐसा निर्वाण है, ऐसे लोकांत को प्राप्त कर लेते हैं । + उसे ही कहते हैं --- अनंतचतुष्टयरूप अंतरंग लक्ष्मी के और समवसरण आदि देवों का आगमन आकाश में गमन, चंवर दुरना आदि बहिरंग लक्ष्मी के ६५
SR No.090307
Book TitleNiyamsara Prabhrut
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorGyanmati Mataji
PublisherDigambar Jain Trilok Shodh Sansthan
Publication Year1985
Total Pages609
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size14 MB
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