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नियमसार-प्राभृतम् गारधर्मामलेग्रन्थेषुपलभ्यते, तत्रैव द्रष्टव्यमस्त्यत्र विस्तरभयेन नोच्यते । सर्वस्मिन्नाचारशास्त्रे देवबंधनायां कृतिकर्मपूर्वक चैत्यपंचगुरुद्वपक्तिकरणविधानं वर्तते । . उक्तं घाचारसारग्रन्थे-. .
. देवतास्तषने भक्तित्यपंचगुरूभयोः।
चतुर्दश्यां तयोर्मध्ये श्रुतभक्तिविधीयते ॥ तात्पर्यमेतत्-ये मुनयः त्रिसंध्यं विधिवत् देववन्दनां कृत्वा एक द्विः त्रिमुहूर्त वा पंचनमस्कारमंत्र स्वात्मानं वा ध्यायन्ति, शेषकालेऽपि जीवितमरणाविषु समतापरिणामं कुर्वते, तेषां स्थायिरूपेण सामायिक भवति । किंच, अत्रापि त्रिगुप्तमुनीनामेव स्थायि सामायिक निगद्यते इति ज्ञात्वा प्राक् त्रिकालसामायिक सुष्ठुतया भवता विधातव्यम् ॥१२५॥ चारित्रसार, अनगारधर्मामृत ग्रन्थों में उपलब्ध हो रहा है । वहीं देखना चाहिये । यहाँ पर विस्तार के भय से नहीं कहते हैं। सभी आचारशास्त्रों में देववन्दना में कृतिकर्मपूर्वक चैत्यभक्ति और पंचगुरुभक्ति इन दो भक्तियों के करने का विधान है।
आचारसार ग्रन्य में कहा भी है
देवता के स्तवन में चैत्य, पंचगरु ये दो भक्तियों की जाती हैं । चतुर्दशी के दिन इन दोनों भक्तियों के मध्य श्रुतभक्ति की जाती है। अर्थात् चतुर्दशी के दिन त्रिकाल देववंदना में चैत्य, श्रुत और पंचगुरु ये तीन भक्तियाँ की जाती हैं ।
तात्पर्य यह हुआ कि जो मुनिजन तीनों संध्याओं में विधिवत् देववन्दना करके एक, दो अथवा तीन मुहूर्त तक पंचनमस्कारमंत्र का या अपनी आत्मा का ध्यान करते हैं और शेष काल में भी जीवन-मरण आदि में समताभाव रखते हैं, उनके स्थायिरूप से सामायिक होती है। क्योंकि यहाँ पर तो तीन गुप्ति धारी मुनियों के ही स्थायी सामायिक कही गई है । ऐसा जानकर आपको पहले त्रिकाल सामायिक अच्छी तरह करनी चाहिये ।।१२५।।
१. अनगारधर्मामृत, अध्याय ९, लोफ १२ से ३० तक । २. आचारसार, अ० ९, श्लोक ४३ ।